वडे जिनस्वरूप भगवान आत्मामां रमणता करवी, एने जाणवो -अनुभववो एने भगवाने जैनशासन कह्युं छे. आ जैनशासन पर्यायमां छे, द्रव्यमां नहीं. आ पूर्ण जिनस्वरूप आत्माने ग्रहण करनार शुद्धोपयोग ए ज जैनशासन छे, परमेश्वरनो मार्ग छे. जेणे आवा आत्माने जाण्यो नथी एणे कांई पण जाण्युं नथी. पर्यायद्रष्टिमां आत्माने बद्धस्पृष्ट, अन्य अन्य अवस्थारूप, अनियत, भेदरूप अने रागरूपे देखे छे ए जैनशासन नथी, ए तो अजैनशासन छे. आ शेठियाओ करोडोनां दान करे, कोई भक्ति, पूजा करे, दया, व्रत पाळे ए कांई जिनशासन नथी, के जैनधर्म नथी वीतरागनी वाणी स्याद्वादरूप छे एटले कोई ठेकाणे रागने पण धर्म कह्यो छे एम नथी. (वीतरागताथी धर्म अने रागथी पण धर्म एवो स्याद्वाद नथी.) धर्मधुरंधर, धर्मना स्थंभ एवा कुंदकुंदाचार्यदेव जेमनुं मंगलाचरणमां त्रीजुं नाम आवे छे ते जे कहे छे ते एकवार पूर्वनो आग्रह छोडीने सांभळ, के अंतरमां एकरूप परमात्मतत्त्व सामान्यस्वभाव निर्लेप भगवान छे एने जाणवो, एनी प्रतीति अने रमणता करवी -एवो जे शुद्धोपयोग छे ते जैनशासन छे. आ जैनशासन अपदेशसान्तमध्यं बाह्य द्रव्यश्रुत तेम ज अभ्यंतर ज्ञानरूप भावश्रुतवाळुं छे. जयसेनाचार्यनी टीकामां आवे छे के बाह्यद्रव्यश्रुतमां एम ज कह्युं छे के अबद्धस्पृष्ट आत्मानो अनुभव करवो ए ज जैनशासन छे. बारअंगरूप वीतरागनी वाणीनो आ ज सार छे -के शुद्धात्मानो अनुभव कर.’ द्रव्यश्रुत वाचक छे, अंदर भावश्रुतज्ञान तेनुं वाच्य छे. द्रव्यश्रुत अबद्धस्पृष्ट आत्माना स्वरूपने निरूपे छे, भावश्रुत अबद्धस्पृष्ट आत्मानो अनुभव करे छे. पंडित राजमलजीए कळश १३ मां आनो खुलासो बहु सारो कर्यो छे. शिष्ये पूछयुं- ‘आ प्रसंगे बीजो पण संशय थाय छे के कोई जाणशे के द्वादशांगज्ञान कोई अपूर्व लब्धि छे.’ तेनुं समाधानः- द्वादशांगज्ञान विकल्प छे. तेमांपण एम कह्युं छे के शुद्धात्मानुभूति मोक्षमार्ग छे. वीतरागी शुद्धात्माने अनुसरीने जे अनुभव थाय ए अनुभूति मोक्षमार्ग छे. एणे वस्तुने जाणी लीधी पछी विकल्प आवे तो शास्त्रो वांचे, पण एवा जीवने शास्त्र भणवानी कोई अटक नथी. आवो मार्ग छे, भाई! संप्रदायमां लोकोए अरे! भगवानना मार्गने पींखी नाख्यो छे. अरे! भगवानना विरह पडया, अने लोको बधा झघडामां पडी गया. कोई कहे के शुभरागथी धर्म थाय, तो वळी कोई कहे शुभराग करतां करतां धर्म थाय भारे विपरीतता. पण शुं थाय! सर्वज्ञता तो प्रगट थई नथी, अने सर्वज्ञस्वभावनो अनुभव नथी. अहीं कहे छे के सर्वज्ञस्वभावनो अनुभव जे शुद्धोपयोग ए जैनशासन छे, जैनधर्म छे. जैनधर्म कोई संप्रदाय नथी, ए तो वस्तुनुं स्वरूप छे.