चक्रवर्ती पासे एक मणिरत्न होय छे. एने घसवाथी सूर्य जेवो प्रकाश थाय छे. आ
प्रकाशमां आखुं लश्कर त्यांथी पसार थई जाय छे. एम अहीं कहे छे के अमोने जे
चैतन्यमणिरत्न छे तेमां एकाग्रतारूप घसारो करवाथी पर्याये पर्याये ज्ञानप्रकाश प्रगट
थाय छे. ए प्रकाशमां अमे मोक्षमार्गमां चाल्या जईए छीए. आचार्यदेव निज
चैतन्यचिंतामणिरत्नमां एकाग्रताथी प्राप्त ज्ञानप्रकाशनी ज भावना करे छे, बीजुं कांई
ईच्छता नथी.
भरेली छे, तेवी रीते
आनंदस्वरूप छे.
छे अने तेमां एकाग्र थतां पर्यायमां पण ज्ञानतेज प्रगट थाय छे.
नथी, सहज ज छे.
पर्यायमां उदय थाय ते पण सदाय रहे छे. त्रिकाळी चीज एकरूप प्रतिभासमान छे.
तेना आश्रये पर्यायमां अनेकतानो नाश थई एकरूपनो अनुभव थाय छे.
एकाकारस्वरूप छे. अखंड अनाकुळस्वरूप भगवान आत्मानो आश्रय लईने जे
अनुभवनी दशा प्रगट थाय ए-जेम वस्तु अविनाशी छे तेम-अविनाशी छे. एनो
पण (एक अपेक्षाए) नाश थतो नथी. अष्टपाहुडना चारित्रपाहुडनी चोथी गाथामां
सम्यग्दर्शन -ज्ञानचारित्रना परिणामने पण ‘अक्षय-अमेय’ कह्या छे. वस्तु जेवी
अक्षय-अमेय छे तेवी आ पर्याय पण अक्षय-अमेय छे. भाई! अध्यात्म सूक्ष्म छे.
एनो एकेक शब्द मंत्र छे. जेम कोईने