भावश्रुतज्ञान ए ज शुद्धनय छे. शुद्धनयनो विषय जे द्रव्यसामान्य छे एनो अनुभव एने ज शुद्धनय कहे छे. अने एज जैनशासन छे. त्रिकाळी शुद्ध ज्ञायकमात्रनो वर्तमानमां भावश्रुतज्ञानरूप अनुभव ए जैनशासन छे केमके भावश्रुतज्ञान ए वीतरागी ज्ञान छे, वीतरागी पर्याय छे.
आत्माना अनुभव विना जीव अनंतकाळथी जन्ममरण करीने-नरक-निगोदनां अनंतानंत दुःखोने प्राप्त थयो छे. देव-गुरु-शास्त्रनी भेदरूप श्रद्धा के नवतत्त्वोनी भेदरूप श्रद्धा ए कांई सम्यक्त्व नथी. कळश टीकाना छठ्ठा कळशमां आवे छे के- संसार दशामां जीवद्रव्य नवतत्त्वरूपे परिणम्यो छे ते तो विभावपरिणति छे, माटे नवतत्त्वरूप वस्तुनो अनुभव मिथ्यात्व छे. ए भेदोमांथी एकरूप ज्ञायकभावने- अबद्धस्पृष्ट आत्माने ग्रहण करी अनुभव करवो एनुं नाम सम्यग्दर्शन छे. नवतत्त्वमांथी एकलो सामान्य ज्ञान-ज्ञान-ज्ञान एवो आत्मा बहार काढी लेवो अने ते एकने अनुभववो ते सम्यग्दर्शन मूळ चीज छे. जेम आंबलीना झाडनां पान उपरउपरथी तोडी ले पण मूळ साबूत रहे तो ते झाड थोडा दिवसोमां फरीथी पांगरे; तेम उपरउपरथी राग मंद करे पण मूळ मिथ्यात्व-पर्यायबुद्धि साबूत रहे तो फरीथी राग पांगरे ज. तेथी तो प्रवचनसार गाथा ९३मां कह्युं छे के जेने परथी भिन्न एकरूप ज्ञायकभावनी द्रष्टि नथी अने एक समयनी पर्यायमां रागने ज पोतानो मानी रोकाई गयो छे ए पर्यायद्रष्टि मूढ छे.
हवे आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-
आचार्य कहे छे के- ‘परमम् महः नः अस्तु’ ज्ञान- प्रकाशनो पुंज उत्कृष्ट तेज प्रकाश अमने प्राप्त थाओ. बीजी कोई चीज अमारे जोईती नथी. व्यवहाररत्नत्रयनो राग अमारे जोईतो नथी. ए राग तो अंधकारमय छे. अमने तो ए अंधकारथी भिन्न चैतन्यप्रकाश प्राप्त हो. ‘यत् सकलकालम् चिद–उच्छलन–निर्भरं’ जे तेज सदाकाळ चैतन्यना परिणमनथी भरेलुं छे. सूर्य जेम जड प्रकाशनो पुंज छे तेम आत्मा चैतन्यप्रकाशनो पुंज छे, चैतन्य प्रकाशमय तेजथी भरेलो छे. बहारनुं आचार्यपद के बीजी के कोई चीजनी मागणी करी नथी, पण अंदरमां जे चैतन्यसूर्य प्रकाशपुंज छे ते पर्यायमां प्राप्त हो एवी ज एक भावना प्रगट करी छे.
चक्रवर्ती छ खंड साधवा जाय छे त्यां वचमां वैताढय पर्वत आवे छे. एमां गुफा आवे छे जेमां खूब ज अंधारुं होय छे. तथा मंगला अने अमंगला नामनी बे नदी आवे छे. अमंगलानो प्रवाह एवो के कोई चीज पडे तो नीचे लई जाय अने मंगलानो