Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२६८ [ समयसार प्रवचन

शास्त्र परद्रव्य छे. एनी श्रद्धानो विकल्प राग छे. ए राग मिथ्यात्व नथी, परंतु ए रागथी अनेकाकार-परज्ञेयाकार थयेलुं जे ज्ञान तेने पोतापणे मानवुं ए मिथ्यात्व छे. राग मिथ्यात्व नथी पण एने धर्म मानवो ए मिथ्यात्व छे. अज्ञानी दया, दान, व्रत, भक्ति आदि रागना ज्ञानने ज ज्ञेयमात्र आस्वादे छे. जेने ज्ञेयाकार ज्ञाननी द्रष्टि अने रुचि छे एने ज्ञेयोथी भिन्न ज्ञानमात्रनो आस्वाद होतो नथी. तेने अंतर्मुखद्रष्टिना अभावे रागनो-आकुळतानो ज स्वाद आवे छे.

तथा जेओ ज्ञानी छे, जेमने महाव्रतादिना रागना परिणाममां लीनता अने रुचि नथी तेओ ज्ञेयोथी भिन्न एकाकार ज्ञाननो ज आस्वाद ले छे. ते निराकुळ अतीन्द्रिय आनंदनो स्वाद छे. ज्ञानी ज्ञेयोमां आसक्त नथी. राग के निमित्त कोईमां एकाकार नथी. साक्षात् भगवान बिराजमान होय तोपण तेमां धर्मीने आसक्ति के एकताबुद्धि नथी. धर्मीने व्यवहाररत्नत्रयनो राग, महाव्रतादि पालननो राग होय परंतु ते एनाथी भिन्न निज चैतन्यस्वरूप जे आत्मा एने ज्ञेय बनावीने ते ज्ञानमात्र एकाकार ज्ञाननो आस्वाद करे छे. ए अनाकुळ आनंदनो स्वाद छे, ए धर्म छे. जेम शाकोथी जुदी मीठानी कणीनो क्षारमात्र स्वाद आवे तेम ज्ञानीने परज्ञेयो अने शुभाशुभभावथी भिन्न एक निज ज्ञायकमात्रना ज्ञाननो ज्ञानमात्र स्वाद आवे छे. एने निश्चय सम्यग्दर्शन अने सम्यग्ज्ञान कहे छे. आत्मा ज्ञानस्वरूप छे, माटे ज्ञाननो स्वाद छे ए आत्मानो ज स्वाद छे.

ज्ञान छे ते आत्मा छे अने आत्मा छे ते ज्ञान छे. आ प्रमाणे ज्ञान ते गुण अने आत्मा गुणी एवा बेनी अभेदद्रष्टिमां आवतुं सर्व परद्रव्योथी रहित अबद्धस्पृष्ट, पोतानी पर्यायोमां एकरूप, निश्चळ अर्थात् वृद्धिहानिथी रहित, पोताना गुणोमां एकरूप अभेद तथा परनिमित्तना लक्षे उत्पन्न थयेल पुण्य-पाप, सुख-दुःखनी कल्पनाथी रहित जे निज स्वरूप तेनो अनुभव ए ज्ञाननो अनुभव छे अने ए सम्यग्ज्ञान छे, जैनधर्म छे. जैनशास्त्रो वांचे, सांभळे अने एनी धारणा करी राखे ए कांई सम्यग्ज्ञान नथी. जिनवाणी तो बाजु पर रही, अहीं तो जिनवाणी सांभळतां जे ज्ञान (विकल्प) अंदर थाय छे ए सम्यग्ज्ञान छे एम नथी. द्रव्यश्रुतनुं ज्ञान ए तो विकल्प छे. परंतु अंदर भगवान चिदानंद रसकंद छे एने द्रष्टिमां लई एक एनुं ज्ञानमात्रनुं अनुभवन करवुं ए भावश्रुतज्ञान छे, ए सम्यग्ज्ञान छे, जैनशासन छे. निज स्वरूपनुं अनुभवन ते आत्मज्ञान छे. शुद्धज्ञानरूप स्वसंवेदन, ज्ञाननुं (त्रिकाळीनुं) स्वसंवेदन अनुभवन ए भावश्रुतज्ञानरूप जिनशासननुं अनुभवन छे. शुद्धनयथी आमां कांई भेद नथी. अहीं त्रण वात आवी. एक तो परद्रव्य अने पर्यायथी पण भिन्न जे अखंड एक शुद्ध त्रिकाळी ज्ञानस्वभाव एनुं अनुभवन