अमे पुस्तक बनावीए छीए. पण पुस्तक बनाववानो जे विकल्प छे ए तो राग छे अने अमे पुस्तक बनावी शकीए छीए एवो भाव ए मिथ्यात्वभाव छे. जडने कोण बनावे? ‘क’ एवो एक अक्षर अनंत परमाणुओनो बनेलो छे. आत्मा एने करी के लखी शके ए त्रणकाळमां बनतुं नथी. अनंत द्रव्य अनंतपणे रहीने-एक एक परमाणु अने अन्य द्रव्य पोतानी अवस्थाने स्वकाळे पृथक्पणे करे छे. ‘णमो अरिहंताणं’ ए तो शब्द छे. अंदर नमन करवानो जे विकल्प उत्पन्न थाय ते राग छे. ते राग द्वारा ज्ञाननो अनुभव ए आत्मानो स्वाद नथी.
परमात्म प्रकाशमां लीधुं छे के आ जीव अनंतवार महाविदेहक्षेत्रमां जन्म्यो छे. त्यां तीर्थंकरदेव नित्य बिराजे छे, तीर्थंकरनो विरह नथी. तो त्यां समोसरणमां पण अनंतवार गयो छे. सम्यग्ज्ञानदीपिकामां लख्युं छे के जीवे पूर्वे अनंतवार प्रत्यक्ष समोसरणमां केवली भगवाननी हीराना थाळ, मणिरत्नना दीवा अने कल्पवृक्षनां पुष्पादिकथी पूजा करी छे तथा दिव्यध्वनि सांभळी छे. परमात्मप्रकाशमां पण ‘भवे भवे पूजियो’ एवो पाठ छे. पण आ तो बधो शुभराग छे. एथी धर्म मानी अनंतकाळथी रखडे छे. जगतने आ बेसवुं आकरुं छे. पण भाई! आत्माना भान विना हजारो स्त्रीओ, अने राजपाट छोडी नग्न दिगंबर साधु थयो होय तोपण दुःखी ज छे; पंचमहाव्रतना परिणाम ए सुख नथी, दुःख ज छे. समयसार नाटकमां मोक्षअधिकारमां ४० मा छंदमां त्यांसुधी लीधुं छे के भावलिंगी मुनिराजने छठ्ठे गुणस्थाने जे पंचमहाव्रतादिना विकल्प उत्पन्न थाय छे ए ‘जगपंथ’ छे. मिथ्याद्रष्टिनी तो वात ज शी करवी? त्यां तो त्यांसुधी लीधुं छे के साचा मुनिराजने पण जे वारंवार विकल्प उत्पन्न थाय छे ए अंतर-अनुभवमां शिथिलता छे, ढीलाश छे. अहीं कहे छे रागथी भिन्न भगवान ज्ञायकस्वरूप आत्मामां झुकाव थतां जे सीधुं ज्ञान ज्ञान द्वारा अनुभवमां आवे छे ते आत्मानो स्वाद छे, ते जिनशासन छे, आत्मानुभूति छे.
अहीं आत्मानी अनुभूतिने ज ज्ञाननी अनुभूति कही छे. अज्ञानीजन स्वज्ञेयने छोडीने अनंत परज्ञेयोमां ज अर्थात् आत्माना अतीन्द्रिय ज्ञानने छोडीने ईन्द्रियज्ञानमां ज लुब्ध थई रह्या छे. निज चैतन्यघनस्वरूप आत्मानो अनुभव नथी एवो अज्ञानी परवस्तु-परज्ञेयोमां लुब्ध छे. तेनी द्रष्टि अने रुचि रागादि पर छे. ते ईन्द्रियज्ञानना विषयोथी अने रागादिथी अनेकाकार थयेल ज्ञानने ज पोतापणे आस्वादे छे; ए मिथ्यात्व छे. देव-गुरु