ॐ
परमात्मने नमः।
श्रीमद्भगवत्कुंदकुंदाचार्यदेवप्रणीत
श्री
समयसार
उपर
परम पूज्य सद्गुरुदेव श्री कानजीस्वामीनां प्रवचनो
श्रीमदमृतचन्द्रसूरिकृता आत्मख्यातिः।
जीव–अजीव अधिकार
हवे, आगळनी गाथानी सूचनारूपे श्लोक कहे छेः-
(अनुष्टुभ्)
एष ज्ञानघनो नित्यमात्मा सिद्धिमभीप्सुभिः।
साध्यसाधकभावेन द्विधैकः समुपास्यताम्।। १५ ।।
साध्यसाधकभावेन द्विधैकः समुपास्यताम्।। १५ ।।
श्लोकार्थः– [एषः ज्ञानघनः आत्मा] आ (पूर्वकथित) ज्ञानस्वरूप आत्मा छे ते, [सिद्धिम् अभीप्सुभिः] स्वरूपनी प्राप्तिना ईच्छक पुरुषोए [साध्यसाधकभावेन] साध्यसाधकभावना भेदथी [द्विधा] बे प्रकारे, [एकः] एक ज [नित्यम् समुपास्यताम्] नित्य सेववायोग्य छे; तेनुं सेवन करो.
भावार्थः– आत्मा तो ज्ञानस्वरूप एक ज छे परंतु एनुं पूर्णरूप साध्यभाव छे अने अपूर्णरूप साधकभाव छे; एवा भावभेदथी बे प्रकारे एकने ज सेववो. १प.