२] [समयसार प्रवचन
हवे आगळनी गाथानी सूचनारूपे श्लोक कहे छे. गाथा १४ मां सम्यग्दर्शननी वात हती, गाथा १प मां सम्यग्ज्ञाननी वात करी, अने गाथा १६ मां दर्शन-ज्ञान- चारित्र त्रणेय ले छे. आ कळश १६ नो उपोद्घात छे.
‘एषः ज्ञानघनः आत्मा’ आ (पूर्वकथित) ज्ञानघनस्वरूप आत्मा छे. जेम पहेलां ‘घी’ एवां आवतां के शियाळाना दिवसोमां अंदर आंगळी तो प्रवेश न पामे परंतु तावेथो पण वळी जाय. (प्रवेश पामे नहि). एम भगवान आत्मा अंदरमां ज्ञानघन छे. तेमां शरीर, वाणी के कर्म तो प्रवेशी शक्तां नथी परंतु दया, दान आदिना विकल्पो के वर्तमान पर्याय पण एमां प्रवेश पामती नथी. एवा ज्ञानघनस्वरूप आत्माने ‘सिद्धिम् अभीप्सुभिः’ स्वरूपनी प्राप्तिना इच्छक पुरुषोए ‘साध्यसाधक भावेन् द्विधा’ साध्य- साधक भावना भेदथी बे प्रकारे, ‘एकः नित्यम् समुपास्यताम्’ एक ज नित्य सेववा योग्य छे; तेनुं सेवन करो. शुं कह्युं? ज्ञानस्वरूप भगवान आत्मानी पूर्ण सिद्ध पर्याय ए साध्य छे अने वर्तमानमां स्वभावनी प्रतीति, ज्ञान अने रमणता ए साधक छे. ज्ञायकभावना (आत्मद्रव्यना) बे भेदज्ञाननी पूर्णतानो भाव ए साध्य अने अपूर्ण सम्यग्ज्ञानरूप परिणति ए साधक. वचमां दया, दान, आदि विकल्पो थाय ए कांई साधक नथी, तथा एनाथी मुक्ति पण प्राप्त थती नथी. आ रीते साध्य-साधक भावना भेदथी बे प्रकारे एक ज आत्मा नित्य सेवन करवा योग्य छे. प्रकाशनो पुंज ज्ञायकस्वरूप भगवान आत्मा पोते ज साधक भावरूप थईने पोते ज साध्य थाय छे, वचमां कोई रागादिनी-व्यवहाररत्नत्रयना परिणामनी एने मदद नथी.
ज्ञानीनी वात सांभळीने केटलाक अज्ञानी लोको पण हवे एम कहेवा लाग्या छे के अमोने अहीं पण आत्माना लक्षे उपवासादि थाय छे. परंतु जेओ कुदेव-कुगुरु- कुशास्त्रने माने छे के जे मिथ्यात्व छे अर्थात् ज्यां सम्यग्दर्शननां ठेकाणां पण नथी त्यां आत्मानुं लक्ष कयांथी होय? जेने ज्ञान अने दर्शन पूर्ण प्राप्त थई गयां छे एवा अरिहंत सर्वज्ञ परमात्मा देव छे. ते सर्व दोषोथी रहित वीतराग छे. एना शरीरनी दशा एवी छे के तेमने क्षुधा, तृषा के रोग आदि दोष होता नथी. तथा साचा निर्ग्रंथ गुरु एने कहे छे के जे महाव्रतादिना विकल्पथी भिन्न पडीने त्रण कषायना अभावपूर्वक सम्यग्दर्शन-ज्ञान सहित चारित्रनी रमणतामां झूले छे. आवुं यथार्थ जाण्या विना भगवानने रोग आदि थाय छे एम माने तथा ज्यां साचा देव-गुरु-शास्त्रनी पण खबर नथी एने आत्माना लक्षे कोई वात (साधना) होई शके नहीं. झीणी वात छे, भाई! आ तो जन्म-मरणनो अंत करवानी वात छे.
अहीं कहे छे के आत्मा चैतन्यघन पिंड छे. एनी निर्विकल्प श्रद्धा, स्वसंवेदन