Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-२] [ ज्ञान अने एमां स्थिरतारूप वीतरागी चारित्र ए साधकभावे आत्मा पोते परिणमे छे अने ए त्रणेनी पूर्णतारूप जे साध्यभाव ते-रूपे पण पोते ज परिणमे छे. आ रीते बे प्रकारे पण एक ज आत्मा सदा सेववा योग्य छे, बीजुं नहीं. साधकभाव अने साध्यभाव ए बन्नेमां एकलो आत्मा ज ज्ञानरूपे परिणमे छे. वचमां जे व्यवहार- रत्नत्रय आवे छे एनुं सेवन करवुं अथवा व्यवहाररत्नत्रय सहाय करे छे एम नथी.

* कळश १पः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

आत्मा तो ज्ञानस्वरूप एक ज छे, परंतु एनुं पूर्णरूप ते साध्यभाव छे अने अपूर्णरूप ते साधकभाव छे. शुं कह्युं? शुद्ध चैतन्य ज्ञायकभावस्वरूप आत्मा साधकभावमां अने साध्यभावमां पोते ज परिणमे छे. साध्य-साधकभावना भावभेदे बे प्रकारे एकनुं सेवन करवुं. आगळ गाथामां पछी कहेशे के दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी पर्यायथी अमे समजावीए छीए, परंतु सेवन एकनुं ज (आत्मानुं) करवुं.