भाग-२] [प
एकोऽपि क्रिस्वभावत्वाद्वयवहारेण मेचकः।। १७ ।।
सर्वभावान्तरध्वंसिस्वभावत्वादमेचकः।। १८ ।।
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हवे, ए ज अर्थनो कलशरूप श्लोक कहे छेः-
श्लोकार्थः– [प्रमाणतः] प्रमाणद्रष्टिथी जोईए तो [आत्मा] आ आत्मा [समम् मेचकः अमेचकः च अपि] एकीसाथे अनेक अवस्थारूप (‘मेचक’) पण छे अने एक अवस्थारूप (‘अमेचक’) पण छे, [दर्शन–ज्ञान–चारित्रैः क्रित्वात्] कारण के एने दर्शन-ज्ञान-चारित्रथी तो त्रणपणुं छे अने [स्वयम् एकत्वतः] पोताथी पोताने एकपणुं छे.
भावार्थः– प्रमाणद्रष्टिमां त्रिकाळस्वरूप वस्तु द्रव्यपर्यायरूप जोवामां आवे छे, तेथी आत्मा पण एकीसाथे एकानेकस्वरूप देखवो. १६. हवे नियविवक्षा कहे छेः- श्लोकार्थः– [एकः अपि] आत्मा एक छे तोपण [व्यवहारेण] व्यवहार- द्रष्टिथी जोईए तो [क्रिस्वभावत्वात्] त्रण-स्वभावपणाने लीधे [मेचकः] अनेकाकाररूप (‘मेचक’) छे, [दर्शन–ज्ञान–चारित्रैः क्रिभिः परिणतत्वतः] कारण के दर्शन, ज्ञान अने चारित्र-ए त्रण भावे परिणमे छे.
भावार्थः– शुद्धद्रव्यार्थिक नये आत्मा एक छे; आ नयने प्रधान करी कहेवामां आवे त्यारे पर्यायार्थिक नय गौण थयो तेथी एकने त्रणरूप परिणमतो कहेवो ते व्यवहार थयो, असत्यार्थ पण थयो. एम व्यवहारनये आत्माने दर्शन, ज्ञान, चारित्ररूप परिणामोने लीधे ‘मेचक’ कहृाो छे. १७.
हवे परमार्थनयथी कहे छेः-
श्लोकार्थः– [परमार्थेन तु] शुद्ध निश्चयनयथी जोवामां आवे तो [व्यक्तज्ञातृत्व–ज्योतिषा] प्रगट ज्ञायक्ताज्योतिमात्रथी [एककः] आत्मा एकस्वरूप छे [सर्व–भावान्तर–