Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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] [समयसार प्रवचन

(अनुष्टुभ्)
आत्मनश्चिन्तयैवालं मेचकामेचकत्वयोः।
दर्शनज्ञानचारित्रैः साध्यसिद्धिर्न चान्यथा।। १९ ।।

__________________________________________________ ध्वंसि–स्वभावत्वात्] कारण के शुद्धद्रव्यार्थिक नयथी सर्व अन्यद्रव्यना स्वभावो तथा अन्यना निमित्तथी थता विभावोने दूर करवारूप तेनो स्वभाव छे, [अमेचकः] तेथी ते ‘अमेचक’ छे-शुद्ध एकाकार छे.

भावार्थः– भेदद्रष्टिने गौण करी अभेदद्रष्टिथी जोवामां आवे तो आत्मा

एकाकार ज छे, ते ज अमेचक छे. १८.

आत्माने प्रमाण-नयथी मेचक, अमेचक कहृाो, ते चिंताने मटाडी जेम साध्यनी सिद्धि थाय तेम करवुं एम हवे कहे छेः-

श्लोकार्थः– [आत्मनः] आ आत्मा [मेचक–अमेचकत्वयोः] मेचक छे-भेदरूप अनेकाकार छे तथा अमेचक छे-अभेदरूप एकाकार छे [चिन्तया एव अलं] एवी चिंताथी तो बस थाओ. [साध्यसिद्धिः] साध्य आत्मानी सिद्धि तो [दर्शन–ज्ञान– चारित्रैः] दर्शन, ज्ञान ने चारित्र-ए त्रण भावोथी ज छे, [न च अन्यथा] बीजी रीते नथी (ए नियम छे).

भावार्थः– आत्माना शुद्ध स्वभावनी साक्षात् प्राप्ति अथवा सर्वथा मोक्ष ते साध्य छे. आत्मा मेचक छे के अमेचक छे एवा विचारो ज मात्र कर्या करवाथी ते साध्य सिद्ध थतुं नथी; परंतु दर्शन अर्थात् शुद्ध स्वभावनुं अवलोकन, ज्ञान अर्थात् शुद्ध स्वभावनुं प्रत्यक्ष जाणपणुं अने चारित्र अर्थात् शुद्ध स्वभावमां स्थिरता-तेमनाथी ज साध्यनी सिद्धि थाय छे. आ ज मोक्षमार्ग छे, ते सिवाय बीजो कोई मोक्षमार्ग नथी.

व्यवहारी लोको पर्यायमां-भेदमां समजे छे तेथी अहीं ज्ञान, दर्शन, चारित्रना भेदथी समजाव्युं छे. १९.

* समयसारः गाथा १६ः उपोद्घात *

१४ मी गाथामां सम्यग्दर्शननो अधिकार अने १प मी गाथामां सम्यग्ज्ञाननो अधिकार कह्यो. हवे अहीं गाथा १६ मां सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप साधकभावनी वात करे छेः-

* गाथा १६ः गाथार्थ उपरनुं प्रवचन *
साधुना साधु पुरुषे दर्शन–ज्ञानचारित्राणि दर्शन, ज्ञान अने चारित्र ‘नित्यम्’

सदा