६] [समयसार प्रवचन
दर्शनज्ञानचारित्रैः साध्यसिद्धिर्न चान्यथा।। १९ ।।
__________________________________________________ ध्वंसि–स्वभावत्वात्] कारण के शुद्धद्रव्यार्थिक नयथी सर्व अन्यद्रव्यना स्वभावो तथा अन्यना निमित्तथी थता विभावोने दूर करवारूप तेनो स्वभाव छे, [अमेचकः] तेथी ते ‘अमेचक’ छे-शुद्ध एकाकार छे.
एकाकार ज छे, ते ज अमेचक छे. १८.
आत्माने प्रमाण-नयथी मेचक, अमेचक कहृाो, ते चिंताने मटाडी जेम साध्यनी सिद्धि थाय तेम करवुं एम हवे कहे छेः-
श्लोकार्थः– [आत्मनः] आ आत्मा [मेचक–अमेचकत्वयोः] मेचक छे-भेदरूप अनेकाकार छे तथा अमेचक छे-अभेदरूप एकाकार छे [चिन्तया एव अलं] एवी चिंताथी तो बस थाओ. [साध्यसिद्धिः] साध्य आत्मानी सिद्धि तो [दर्शन–ज्ञान– चारित्रैः] दर्शन, ज्ञान ने चारित्र-ए त्रण भावोथी ज छे, [न च अन्यथा] बीजी रीते नथी (ए नियम छे).
भावार्थः– आत्माना शुद्ध स्वभावनी साक्षात् प्राप्ति अथवा सर्वथा मोक्ष ते साध्य छे. आत्मा मेचक छे के अमेचक छे एवा विचारो ज मात्र कर्या करवाथी ते साध्य सिद्ध थतुं नथी; परंतु दर्शन अर्थात् शुद्ध स्वभावनुं अवलोकन, ज्ञान अर्थात् शुद्ध स्वभावनुं प्रत्यक्ष जाणपणुं अने चारित्र अर्थात् शुद्ध स्वभावमां स्थिरता-तेमनाथी ज साध्यनी सिद्धि थाय छे. आ ज मोक्षमार्ग छे, ते सिवाय बीजो कोई मोक्षमार्ग नथी.
व्यवहारी लोको पर्यायमां-भेदमां समजे छे तेथी अहीं ज्ञान, दर्शन, चारित्रना भेदथी समजाव्युं छे. १९.
१४ मी गाथामां सम्यग्दर्शननो अधिकार अने १प मी गाथामां सम्यग्ज्ञाननो अधिकार कह्यो. हवे अहीं गाथा १६ मां सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप साधकभावनी वात करे छेः-
सदा