भाग-२] [७ ‘सेवितव्यानि’ सेववा योग्य छे. जुओ, साधु कोने कहीए? के जे दर्शन, ज्ञान, चारित्रनुं सेवन करे ते साधु छे. आ दर्शन-ज्ञान-चारित्र ए निश्चयरत्नत्रयनी वात छे. अखंड, अभेद, एकरूप जे त्रिकाळी ज्ञायकभाव एनी द्रष्टि ए निर्विकल्प सम्यग्दर्शन, एनुं स्वसंवेदनज्ञान ए सम्यग्ज्ञान अने एमां रमणता-लीनता-आचरणरूप अनुष्ठान ए सम्यक्चारित्र. आ निश्चयरत्नत्रयनुं सेवन करे ते साधु छे. पांच महाव्रत के व्यवहार- रत्नत्रयना विकल्प ए कांई निश्चयचारित्र नथी, निश्चयधर्म नथी. ए तो राग छे, विकार छे अने तेथी सेववा योग्य नथी. आ तो वीतरागमार्गनुं कथन छे. भाई! अंतःतत्त्वस्वरूप जे शुद्धचैतन्यघन एनां श्रद्धा-ज्ञान अने शांतिरूप जे निर्विकल्प वीतरागी पर्याय एनुं सेवन करवा योग्य छे एम व्यवहारथी कथन छे. भगवान ज्ञायकस्वभाव एकलो छे. ए ज्ञायकस्वभाव एकनुं सेवन करवुं ए निश्चय छे, परमार्थ छे, वास्तविक छे. तथा उपदेशमां भेद पाडीने दर्शन, ज्ञान अने चारित्र सदा सेववा योग्य छे एम कहेवुं ए व्यवहार छे. एकरूप आत्मामां दर्शन, ज्ञान अने चारित्र एम त्रण प्रकार कहेवा ए व्यवहार छे.
‘आत्मानं च एव’ एक आत्मा ज ‘जानीहि’ जाणो. अखंड अभेद एकरूप जे ज्ञायकभावस्वरूप आत्मा ते एकनुं सेवन करतां तेमां ए त्रणेय पर्यायो आवी जाय छे. पण त्रण पर्यायनुं लक्ष करवुं ए व्यवहारनय छे. दर्शन-ज्ञान-चारित्र तो निश्चय छे (निश्चयरत्नत्रय छे), पण अखंड एक निश्चय स्वभावनी अपेक्षाए ए त्रणेय पर्याय छे अने तेथी व्यवहार छे, मलिन छे. झीणी वात, भाई! पण अलौकिक वात छे. शुं कहे छे? ए त्रणेने निश्चयनयथी एक आत्मा ज जाणो. अंतर ज्ञायकभावनी एकाग्रता थवाथी ए त्रणेय निर्मळ पर्यायो थई जाय छे परंतु ए पर्यायोनुं लक्ष करी तेमनो आश्रय करवा योग्य नथी. अहाहा! ए निश्चय मोक्षमार्गनी पर्याय आश्रय करवा लायक नथी. ए त्रण छे माटे व्यवहार छे. आ निश्चय (मोक्षमार्ग) पण व्यवहार छे. गजब वात! भगवान! आ मार्ग तो अत्यारे गायब (गूम) थई गयो. मोक्षमार्गथी विरुद्ध बहारनी बधी कडाकूट थई गई छे. अहीं तो भगवान कुंदकुंदाचार्य कहे छे-ए त्रणेयने निश्चयथी एक आत्मा ज जाणो. ल्यो, आ अंदरमां एवो आत्मा बिराजमान छे.
“आ आत्मा जे भावथी साध्य तथा साधन थाय ते भावथी ज नित्य सेववा योग्य छे.” अहीं एम कहे छे के आ आत्मा जे भावथी साध्य एटले मोक्ष तथा साधन एटले मोक्षमार्गनी पर्याय थाय ते भावथी सेववा योग्य छे. निश्चयमोक्षमार्गनी पर्याय ए साधन छे, पण व्यवहाररत्नत्रयनो विकल्प ते साधन नथी. अहीं अस्तिथी कथन कर्युं एमां नास्ति आवी गई. आ आत्माने (जे भावथी) पोतानो आश्रय करवाथी पूर्ण