८] [समयसार प्रवचन साध्य (मोक्ष) प्रगट थाय छे तथा जे भावथी पोतानो आश्रय करवाथी वर्तमान साधकभाव (मोक्षमार्ग) उत्पन्न थाय छे, ते भावथी एक आत्मा ज नित्य सेववा योग्य छे. झीणी वात, भाई! पण अनंतकाळथी पोतानी जे अखंड अभेद चीज छे एनी द्रष्टि कयारेय करी ज नथी ने शास्त्र सघळां भणे पण अंतर्द्रष्टि न करे तो तेथी शुं?
शुं कहे छे? आ आत्मा जे भावथी साध्य नाम मोक्ष अने साधन नाम मोक्षोपाय थाय ते भावथी ज नित्य सेववा योग्य छे एम पोते ईरादो राखीने बीजाओने व्यवहारथी प्रतिपादन करे छे के-“साधु पुरुषे दर्शन, ज्ञान, चारित्र सदा सेववा योग्य छे.” सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ए त्रणे पर्याय छे तेथी व्यवहार छे. एक आत्मा जे ज्ञायकभाव पूर्णानंदस्वरूप एकस्वभावी छे एनी सेवा करवी ए निश्चय छे, परमार्थ छे. पहेलां पण एम कह्युं के-‘आत्मा सेववो’; परंतु एवा अभेद कथनथी व्यवहारीजन समजी शक्तो नथी तेथी तेने ज्ञान-दर्शन-चारित्रना भेद पाडीने व्यवहारथी समजाव्युं के साधु पुरुषे दर्शन-ज्ञान-चारित्रनुं सेवन करवुं. भगवान आत्मा ते निश्चय छे अने तेनी अपेक्षाए आ दर्शन-ज्ञान-चारित्र एम त्रणपणानुं सेवन कहेवुं ए व्यवहार छे, मेचकपणुं छे (मलिनपणुं छे), अनेकपणुं छे; दर्शनस्वभाव, ज्ञानस्वभाव, चारित्रस्वभाव इत्यादि अनेकस्वभाव थई जाय छे तेथी ते व्यवहार छे. व्यवहारथी उपदेशमां आ प्रमाणे कथन आवे छे, पण आशय तो एक शुद्ध निश्चय आत्मानुं सेवन कराववानो छे.
लोको तो माने के अत्यारे पांच महाव्रत अने अठ्ठावीस मूलगुण पाळे ए साधु. पण भाई, साधुने माटे आहार बनावे अने जो ते आहार साधु ले तो ते द्रव्यलिंगी पण नथी. निश्चय तो नथी पण व्यवहारनांय ठेकाणां नथी. कोई एम कहे के निश्चय होय पछी व्यवहार गमे तेवो होय, व्यवहारनुं शुं काम छे? तो ते वात बराबर नथी. निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रवंत साधुने पांच महाव्रत तथा र८ मूळगुण आदिनो व्यवहार यथार्थपणे होय छे. साधुने माटे चोको बनावे अने साधु ते आहार ले एवुं प्राण जाय तोपण त्रणकाळमां बने नहि. लोको एम कहे छे के शरीर रहे तो प्राण टके अने तो धर्म थाय. पण एथी तो धूळेय धर्म नथी. अहीं तो कहे छे के आत्मामां रहे-टके तो धर्म थाय. भगवान शुद्ध त्रिकाळी ज्ञायकनी द्रष्टिमां रहे तो धर्म थाय भगवान कुंदकुंदाचार्यदेवे आ १६ मी गाथामां सोळवलुं सो टचनुं सोनुं बताव्युं छे.
पांच महाव्रत अने अठ्ठावीस मूलगुण ए चारित्र नथी पण आस्त्रव अने बंधनुं ज कारण छे. निश्चय आत्माना अनुभवरूप चारित्र होय तो आने व्यवहारचारित्रनो उपचार आवे. तेम छतां ए छे तो बंधनुं ज कारण. अहीं एनी वात नथी. अहीं तो कहे छे के आत्मा जे परिपूर्ण शुद्ध वस्तु छे ते ज साधकपणे-ज्ञानपणे परिणमे छे. अने ते साधकभावनुं परिपूर्णतामां परिणमन ते साध्य. आत्मा पोते ज अपरिपूर्ण