गाथा-१६] [९ साधकभावे अने परिपूर्ण साध्यपणे परिणमे छे. वचमां बाह्य व्यवहारक्रिया आवे छे तो मोक्षमार्ग थाय छे एम नथी.
साधु पुरुषे दर्शन, ज्ञान, चारित्र सदा सेववा योग्य छे एम भेद पाडीने कथन करवामां आवे छे. आठमी गाथामां कह्युं ने के दर्शन-ज्ञान-चारित्रने जे हंमेशा प्राप्त होय ते आत्मा. एवो भेद कर्यो पण परमार्थे जोवामां आवे तो ए त्रणे एक आत्मा ज छे; केमके त्रणे पर्याय आत्माथी जुदी नथी. ए एकनुं (आत्मानुं) सेवन करवाथी (निर्मळ) पर्याय उत्पन्न थाय छे, पण त्रणनुं सेवन करवाथी (निर्मळ) पर्याय उत्पन्न थाय छे एम नथी. सूक्ष्म वात, भाई! आ तो आत्मा, बापु! एमां भगवान बिराजे छे. अंदर बधा आत्मा भगवान स्वरूप ज छे. ए एकरूप सच्चिदानंद प्रभु जेनो ज्ञायक एक स्वभाव छे ते द्रव्यनुं सेवन करवुं ए परमार्थ छे. सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र एम त्रण प्रकारे सेवन करवुं ए व्यवहारनुं कथन छे. कळश टीकाकारे आत्मा मेचकः चेतन द्रव्य जे त्रण प्रकारे थाय छे ते मेचक कहेतां मलिन छे एम कह्युं छे. सम्यग्दर्शन ज्ञान- चारित्रनी निर्मळ पर्याय ए एकना त्रण भेद थया ए मलिन छे, व्यवहार छे. पर्याय छे ने? पर्याय उपर लक्ष जाय तो राग ज थाय. अने राग मलिन ज छे ने?
नियमसारनी पांचमी गाथामां कह्युं छे के सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी निर्मळ पर्याय ए बहिःतत्त्व छे. अहीं रागनी वात तो छे ज नहि, निर्मळ पर्यायने बहिःतत्त्व कही छे. तथा अंतःतत्त्व शुद्ध परमात्मा छे. पूर्ण अंतःतत्त्वरूप ज्ञायक परमात्मा अने बहिःतत्त्वरूप निर्मळ पर्याय ए बे तत्त्वोनी श्रद्धा करवी ए व्यवहार समक्ति छे. जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध अने मोक्ष ए सात तत्त्वोनी श्रद्धा ए पण व्यवहार श्रद्धा छे. व्यवहार श्रद्धा ए कांई श्रद्धागुणनी पर्याय नथी; ए तो राग छे, विकार छे. अहीं कहे छे के जे सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी निर्मळ पर्याय छे ए बहिःतत्त्व छे. ए बहिःतत्त्व उपर लक्ष जाय ए व्यवहार छे, मलिन छे, अनेकाकार छे, अनेकस्वभाव छे. जुओ, कई अपेक्षाए लीधुं? समयसार कळश टीका कळश १६ मां आवे छे के- सामान्यपणे अर्थग्राहकशक्तिनुं नाम दर्शन छे, विशेषपणे अर्थग्राहकशक्तिनुं नाम ज्ञान छे अने शुद्धत्वशक्तिनुं नाम चारित्र छे. आम शक्तिभेद करतां एक जीव त्रण प्रकारे थाय छे, तेथी मलिन कहेवानो व्यवहार छे.
एकने त्रण प्रकारे कहेवो ए व्यवहार छे अने व्यवहार छे ते असत्यार्थ छे. कळश १७ ना भावार्थमां आवे छे के शुद्धद्रव्यार्थिकनयथी आत्मा एक छे, पण पर्यायार्थिक नये एकने त्रणरूप परिणमन थाय छे एम कहेवुं ते व्यवहार छे, असत्यार्थ छे. अहीं त्रिकाळी, भूतार्थ द्रव्यने मुख्य करीने निश्चय कही सत्यार्थ कह्युं छे अने पर्यायमात्रने गौण करीने व्यवहार कहीने असत्यार्थ कह्यो छे.