१० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२
आ तो वीतरागनो मार्ग छे. भाई! प्रभु त्रणलोकनो नाथ सर्वज्ञ छे. एनी एक समयनी पर्यायमां सर्व लोकालोक समाई गया छे-जाणवामां आवी गया छे. आप्तमीमांसाना ४८ मां श्लोकमां स्वामी समंतभद्राचार्य कहे छे के-हे नाथ! समय एक अने उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य त्रण. एक समयमां उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य आपना ज्ञानमां आव्यां-एटले सर्व द्रव्यो ज्ञानमां आव्यां अने कह्यां तेथी आप सर्वज्ञ छो एम हुं कहुं छुं. एक ‘क’ बोले एमां असंख्य समय जाय. एवा एक समयमां द्रव्यमां उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य त्रण जेणे जाण्यां तेणे आत्मा जाण्यो, अने तेने सर्व द्रव्योनुं ज्ञान थयुं. तेथी ते सर्वज्ञ छे. भाई! आ तो त्रणलोकना नाथ केवळीए एक समयमां जे जोयुं अने जे कथनमां आव्युं ए अलौकिक वातो छे. अहीं कहे छे के एक (आत्मा) ने त्रणरूप परिणमतो कहेवो ते व्यवहार थयो, असत्यार्थ पण थयो तेथी तेने मेचक-मलिन कह्यो छे. (कळश १७ भावार्थ) अहाहा! शुं अर्थ कर्यो छे जयचंद्र पंडिते! पहेलांना पंडितो वस्तुनी जेवी स्थिति छे तेवा अर्थ करता हता. पण हमणां घणी गरबड थई गई छे.
व्यवहार मोक्षमार्गनुं सेवन करवुं, रागनुं सेवन करवुं ए वात तो छे नहि. रागनुं शुं सेवन करवुं? एनो तो अभाव करवो छे. परंतु भगवान ज्ञायकस्वभावी एक चैतन्यघनस्वरूप जे आत्मा तेनी द्रष्टि, ज्ञान अने चारित्र ए निश्चयथी परमार्थ छे. ए निश्चयथी परमार्थ जे पर्याय छे तेने अहीं व्यवहार कहीने मलिन कही छे. पहेलां एनुं विकल्पमां पण यथार्थ ज्ञान तो करे, ज्यां व्यवहारे विकल्पवाळुं ज्ञान पण यथार्थ नथी त्यां सत्यज्ञान-सम्यग्ज्ञान होतुं नथी.
साधु पुरुषे त्रणनुं (दर्शन-ज्ञान-चारित्रनुं) सेवन करवुं एम व्यवहारथी कहेवामां आव्युं छे, “पण परमार्थथी जोवामां आवे तो ए त्रणेय एक आत्मा ज छे- कारण के तेओ अन्य वस्तु नथी पण आत्मानी ज पर्यायो छे.” भाषा जुओ. मोक्षमार्गनी पर्याय (निश्चयरत्नत्रयनी पर्याय) आत्मानी पर्याय छे, परन्तु व्यवहाररत्नत्रयनो विकल्प ए आत्मानी पर्याय नथी, असद्भूत छे. आ निश्चयरत्नत्रय ए सद्भूत व्यवहार छे. बनारसीदास विरचित परमार्थवचनिकामां कह्युं छे के “द्रव्य निष्क्रिय छे. सम्यग्ज्ञान (स्वसंवेदन) अने स्वरूपाचरणनी कणिका जागे त्यारे मोक्षमार्ग साचो. मोक्षमार्ग साधवो ए व्यवहार अने शुद्ध द्रव्य अक्रियारूप निश्चय छे.” निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप मोक्षमार्ग साधवो ए व्यवहार छे. पर्याय छे ने? तेथी. “ए प्रमाणे निश्चय-व्यवहारनुं स्वरूप सम्यग्द्रष्टि जाणे छे, पण मूढ जीव (अज्ञानी) जाणे नहि अने माने पण नहि.”
हवे द्रष्टांत आपे छेः ‘जेम कोई देवदत्त नामना पुरुषनां ज्ञान, श्रद्धान अने आचरण देवदत्तना स्वभावने उल्लंघतां नहि होवाथी (तेओ) देवदत्त ज छे अन्य वस्तु नथी. तेम आत्मामां पण आत्मानां ज्ञान, श्रद्धान अने आचरण आत्माना स्वभावने उल्लंघतां नहि