Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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गाथा-१६] [ ११ होवाथी (तेओ) आत्मा ज छे, अन्य वस्तु नथी. माटे एम स्वयमेव सिद्ध थाय छे के एक आत्मा ज सेवन करवा योग्य छे.” मूळ पाठमां (गाथामां) दर्शन, ज्ञान, चारित्र लीधुं छे, अहीं टीकामां ज्ञान, श्रद्धान अने आचरण एम लीधुं छे केम के जाणवामां आवे त्यारे प्रतीति थाय छे. गाथा १७-१८मां आवे छे के (आत्मा) वस्तु ज्ञानपर्यायमां पूर्ण, अखंड जाणवामां आवे तो जाणीने तेनी यथार्थ प्रतीति करे. वस्तु ख्यालमां आव्या विना प्रतीति कोनी? वाह! दिगम्बर संतोनी कथनी पण केवी रहस्यमय! लोको तो बहारमां आम कर्युं अने तेम कर्युं, नग्न थई गया अने लुगडां फेरव्यां एटले माने के थई गयो मोक्षमार्ग. पण अहीं तो कहे छे के-तेथी स्वयं सिद्ध थाय छे के एक आत्मानुं ज सेवन करवाथी त्रणे पर्यायरूप भावो प्रगट थाय छे. तेथी एक आत्मा ज सेववा योग्य छे. पहेलां त्रणेने व्यवहारथी सेववा योग्य कह्या हता-ते समजाववा माटे कह्या हता. हवे कहे छे निश्चयथी एक आत्मा ज सेववा योग्य छे, त्रण नहि.

छठ्ठी गाथामां पण आवे छे के पर तरफनुं लक्ष छोडी एक निज त्रिकाळी ज्ञायकभावनी सेवा-उपासना करवी. जुओ टीकाना पहेला फकरानी छेल्ली बे लीटी-“ तेथी प्रमत्त पण नथी अने अप्रमत्त पण नथी; ते ज समस्त अन्य द्रव्योना भावोथी भिन्नपणे उपासवामां आवतो शुद्ध कहेवाय छे.” अहीं अन्य द्रव्यना भावो एटले द्रव्यकर्म अने द्रव्यकर्मना उदयादिनुं लक्ष छोडी वर्तमान पर्याय एक त्रिकाळी ज्ञायकभावनुं लक्ष करी तेमां झूके ते उपासना-सेवा छे. ए पर्यायमां शुद्धनो अनुभव थाय छे के वस्तु त्रिकाळ शुद्ध छे. एम ने एम ज शुद्ध छे, शुद्ध छे एवी वात अहीं नथी. अन्य द्रव्योना भावोथी भिन्न एम पाठ छे ने? एटले ज्यारे अन्य द्रव्योना भावोथी लक्ष छूटी जाय छे त्यारे पोतानामां जे विकारीभाव हता तेनुं पण लक्ष छूटी जाय छे. अहाहा! शुं टीका छे? समयसार तो भूप छे, भूप; सर्व आगमनो सार.

भगवान आत्मा ए ज्ञायकरूप चैतन्यभाव छे, अने शुभाशुभभाव अचेतन छे. दया, दान, महाव्रतादिभाव अचेतन छे, एमां चैतन्यना तेजनो अंश नथी. जे ज्ञायकभाव छे ते शुभाशुभभावोना स्वभावे परिणमतो नथी. (ज्ञायकभावथी जडभावरूप थतो नथी) ज्ञायक ज्ञायकरूपे ज हंमेशां रहे छे. ज्यारे ज्ञायकभाव शुभाशुभभावोरूपे कदीय थतो ज नथी तो पछी ते प्रमत्त के अप्रमत्त केवी रीते थाय? न ज थाय. तेथी ते प्रमत्त पण नथी अने अप्रमत्त पण नथी, ए अहीं कह्युं के त्रिकाळी एक आत्मा ज सेववा योग्य छे. आ सम्यक् एकान्त छे. एक आत्मा सेववा योग्य छे अने बीजुं कांई (पर्याय) सेववा योग्य नथी ए रीते अनेकान्त छे, ते भगवाननो मार्ग छे. पण कथंचित् आत्मानुं सेवन करवुं अने कथंचित् पर्यायनुं सेवन करवुं एम कह्युं नथी. ते अनेकान्त नथी पण फूदडीवाद छे.

ज्ञायकभाव तो एकरूप छे. ते एकनुं सेवन करवाथी पर्याय त्रण थई जाय