Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 293 of 4199

 

१२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ छे, अनेक स्वभावरूप थई जाय छे. दर्शन, ज्ञान अने चारित्र त्रणेयनो भिन्न भिन्न स्वभाव छे. दर्शननो प्रतीति-स्वभाव, ज्ञाननो जाणवारूप स्वभाव अने चारित्रनो शांति अने वीतरागतारूप स्वभाव छे. अहाहा! भगवान एकरूप ज्ञायकस्वभावी आत्मानी सेवा करवाथी अनेकरूप स्वभावपर्याय उत्पन्न थाय छे. आ अनेकरूप स्वभावपर्यायनी सेवा करवी ए तो व्यवहारथी उपदेश आप्यो छे. तेथी द्रष्टिमां सेववा योग्य एक आत्मा ज छे एम सिद्ध थाय छे. आ सोळमी गाथा जाणे सोळवलुं सोनुं!

१४ मी गाथामां सम्यग्दर्शननी प्रधानताथी कथन छे. १प मी गाथामां ज्ञाननी प्रधानताथी कह्युं के ज्ञाननी अनुभूति ते आत्मानुभूति ज छे. अहीं कहे छे के सम्यग्दर्शन ए आत्मानुं, ज्ञाननी अनुभूति ते आत्मानी अने एमां स्थिरता करवी ए चारित्र पण आत्मानुं. पण ए त्रण पर्याय थई, भेद थयो, त्रण प्रकारनो स्वभाव थयो, ज्यारे भगवान आत्मा तो एकरूप ज्ञायकस्वभावी छे.

प्रश्नः–तत्त्वार्थसूत्रमां एम आवे छे केसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः। निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र मोक्षमार्ग छे.

उत्तरः–ए निश्चय छे, पण ए पर्यायनो निश्चय छे. ए पर्यायथी कथन छे तेथी व्यवहारनयनुं कथन छे. वस्तु एकरूप ज्ञायकभाव ए निश्चय छे. सम्यग्दर्शन छे तो निश्चय पण भेद पाडीने कथन करवुं ए व्यवहार छे, प्रवचनसार गाथा २४२ मां आवे छे के- भेदथी कथन करवुं ए व्यवहार छे अने अभेदथी निश्चय. (गाथा २४२ टीका, बीजो पेरेग्राफ) “ते (संयतत्त्वरूप अथवा श्रामण्यरूप मोक्षमार्ग) भेद्रात्मक होवाथी ‘सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र मोक्षमार्ग छे’ एम पर्याय प्रधान व्यवहारनयथी तेनुं प्रज्ञापन छे.” गाथा २४२ पछीना श्लोक १६ मां आवे छे के-“ए प्रमाणे प्रतिपादकना आशयने वश, एक होवा छतां पण अनेक थतो होवाथी (अर्थात् अभेद प्रधान निश्चयनयथी एक एकाग्रतारूप होवा छतां पण कहेनारना अभिप्राय अनुसार भेदप्रधान व्यवहारनयथी अनेकपणे दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूपपणे थतो होवाथी) एक्ताने (एक लक्षणपणाने) तेम ज त्रिलक्षणपणाने पामेलो जे अपवर्गनो मार्ग....” जुओ एकने पामेलो ए निश्चय छे, त्रणरूप पर्यायने पामेलो ते व्यवहार छे. बन्नेने एकसाथे जाणवो ए प्रमाण छे.

अहो! कुंदकुंदाचार्यना शास्त्रोमां तो घणुं गूढ अने गंभीर सत्यनुं कथन आवे छे. श्रीमद् राजचंद्र कहे छे के श्वेतांबरनी मोळाश-ढीलपने लईने रस ढीलो पडी जाय छे ज्यारे दिगंबरनां तीव्र वचनोने लईने रहस्य समजी शकाय छे. आ तो श्रीमद्दे मीठाशथी कह्युं छे. पंडित श्री टोडरमलजीए मोक्षमार्ग प्रकाशकना पांचमा अधिकारमां साफ साफ खुलासो कर्यो छे के श्वेतांबर अने स्थानकवासी ए अजैन छे, जैन नथी.