गाथा-१६] [ १३ बधी (शास्त्रोनी) साक्षी अहीं पडी छे. आ तो जैनधर्म-वीतरागनो मार्ग छे. सर्वज्ञ वीतरागदेवे गणधर अने इन्द्रोनी वच्चे समवशरणमां जे दिव्यध्वनि करी हती ते आ छे.
हवे भावार्थमां पंडित जयचंदजी कहे छे के दर्शन, ज्ञान, चारित्र ए त्रणे आत्मानी ज पर्यायो छे, कोई जुदी वस्तु नथी. तेथी साधु पुरुषोए एक आत्मानुं ज सेवन करवुं-ए निश्चय छे. अने व्यवहारथी अन्यने ए ज उपदेश आपवो. उपदेश ए व्यवहार विकल्परूप छे.
हवे, ए ज अर्थनो कळशरूप श्लोक कहे छेः-
‘प्रमाणतः’ प्रमाणद्रष्टिथी जोईए तो ‘आत्मा’ आ आत्मा ‘समम्’ एकीसाथे ‘मेचकः’ अनेक अवस्थारूप एटले पर्यायना भेदरूप मेचक पण छे ‘च’ अने ‘अमेचकः अपि’ एक अवस्थारूप अभेद अमेचक पण छे. हवे एनो खुलासो कर्यो के एने ‘दर्शन–ज्ञान–चारित्रैः त्रित्वात्’ दर्शन-ज्ञान-चारित्रथी तो त्रणपणुं छे ए व्यवहार छे तथा ‘स्वयम् एकत्वतः’ पोताने पोताथी एकपणुं छे ए परमार्थ छे. एकत्व एटले एकरूप त्रिकाळी स्वभाव ए एकपणुं ए निश्चय अने दर्शन-ज्ञान-चारित्र एम त्रणपणुं-अनेकपणुं ए व्यवहार. अहाहा! शैली तो जुओ. वस्तु ज्ञायकभाव एकरूप स्वभाव, अखंड ज्ञाननो पुंज-सर्वज्ञस्वभावी चीज छे. भगवान सर्वज्ञस्वभावी पदार्थ एक स्वभाव वस्तु छे एनी द्रष्टि अने एकाग्रता ए निश्चयथी एनी सेवना छे अने दर्शन-ज्ञान-चारित्र ए त्रण भेदने सेववा एम कहेवुं ए व्यवहार कथन छे. व्यवहार भेदरूप होवाथी तेने मलिन कह्यो छे. एकरूप स्वभाव निर्मळ छे अने अनेक स्वभावने- मलिन कहेवानो व्यवहार छे.
“प्रमाणद्रष्टिमां त्रिकाळस्वरूप वस्तु द्रव्यपर्यायरूप जोवामां आवे छे, तेथी आत्मा पण एकीसाथे एक-अनेकरूप देखवो.” त्रिकाळ द्रव्यपणे एक अने पर्यायपणे अनेक; दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी निर्मळ पर्याय ए अनेक अने आत्मा (द्रव्ये) एक. ए बन्नेने प्रमाणथी एक साथे देखवुं अने जाणवुं एम कहे छे. ‘साधु पुरुषे दर्शन, ज्ञान, चारित्रने सेववां’ ए व्यवहारथी कथन छे, ए भेद कथन छे, मलिन छे, अनेक स्वभावरूप कथन छे, जाणवा लायक छे. पण एने पहेलां आत्मा एकरूप छे, एक स्वभावी छे एवुं ज्ञान थयुं एमां पर्याय त्रण थई गई. एकरूप देखवो ए निश्चय अने त्रणरूप देखवो ए व्यवहार छे. बन्नेने एकीसाथे देखवो ए प्रमाण छे.
वस्तु जे छे एमां परनी वात ज नथी. शरीर, कर्म, वाणी अने विकल्पनी तो