Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ अहीं वात ज नथी. भगवान शुद्ध चैतन्यघन एक ज्ञायकभाव जेने छठ्ठी गाथामां प्रमत्त- अप्रमत्त पर्याय विनानो एक ज्ञायकस्वभाव कह्यो छे एने देखवो ए तो निश्चय थयो अने तेने त्रणपणे परिणमतो जाणवो ए व्यवहार थयो. बेयने एकीसाथे जाणवो ए प्रमाण थयुं.

अहाहा! आश्रययोग्य आदरणीय तरीके एक त्रिकाळी (द्रव्य) छे, अने जाणवालायक छे ए तो व्यवहारनो विषय जे त्रणपणे परिणमे छे ते (पर्याय) छे. तेमां पण जे त्रिकाळी निश्चय एक छे तेने राखीने बीजुं पर्यायनुं ज्ञान (तेमां) भेळव्युं ते प्रमाण छे. शुं कह्युं? त्रिकाळ ज्ञायकभाव एकरूप छे ते निश्चय तथा तेनी साथे पर्यायना भेदनुं ज्ञान करवुं ते व्यवहार. ए निश्चय साथे व्यवहारनुं ज्ञान थयुं (भेळव्युं) तो प्रमाणज्ञान कहेवाय. प्रमाणज्ञानमां साथे व्यवहार आव्यो माटे निश्चय अंदर भूलाई गयो एम नथी. निश्चय तो एकरूप छे ज. निश्चय तो प्रमाणमां पहेलां आव्यो ज.

हवे नयविवक्षा कहे छेः-

* कळश १७ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘एकोऽपि’ आत्मा एक छे, ज्ञायकस्वभावी वस्तु भगवान आत्मा तो एक ज छे तोपण ‘व्यवहारेण’ व्यवहारद्रष्टिथी जोवामां आवे तो ‘त्रिस्वभावत्वात्’ त्रण स्वभावपणाने लीधे ‘मेचकः’ अनेकाकाररूप मेचक छे, ‘दर्शन–ज्ञान–चारित्रैः त्रिभिः परिणतत्वतः’ कारण के दर्शन ज्ञान अने चारित्र-ए त्रण भावे परिणमे छे.

भगवान आत्मा ज्ञायकस्वभावरूप एक स्वरूपे ज छे. पण तेमां त्रण प्रकारना (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र एवा) परिणमनरूप व्यवहारद्रष्टिथी जोईए तो अनेकाकार छे, मेचक छे. स्वभाव चिदानंद जे द्रष्टिनो-सम्यग्दर्शननो विषय छे ते तो एकरूप ज छे, तेना त्रण भेद पाडवा ए व्यवहार छे, शुभभावरूप व्यवहारनी अहीं वात ज नथी. ए तो संसार खाते छे.

अहाहा....! कहे छे के आत्माने द्रव्यथी जुओ तो आत्मा एक छे. वस्तु तरीके ज्ञायकस्वभाव एक चिद्घन निश्चयथी एक स्वरूपे ज छे. तोपण व्यवहारथी जोवामां आवे तो सम्यग्दर्शन-प्रतीति, सम्यग्ज्ञान-अवबोध-जाणवुं अने सम्यक्चारित्र-स्थिरता- विश्राम लेवो-एवा जे त्रण प्रकार छे ए मेचक छे. त्रण प्रकार जोवा ए मेल छे. आकरी वात छे. भगवान! अत्यारे तो लोको आ (शुभराग) क्रिया आदि बहारनी प्रवृत्ति करे छे पण दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी तथा वस्तुस्थितिनी तो वात ज जाणता नथी. अंदर वस्तु जे ज्ञायक छे ते आत्मा छे अने (बहार) आ शरीर, वाणी इत्यादि छे ए तो जड माटीधूळ छे; ते आत्मामां नथी अने आत्मानां नथी. कर्म जे जड छे ते आत्मामां नथी अने आत्मानां नथी. वळी पुण्य-पापना भाव, दया, दान, व्रत, भक्ति, पूजा वगेरेना भाव तथा काम, क्रोधादि भाव ए पण आत्मामां नथी अने आत्माना नथी.