Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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गाथा-१६] [ १प

हवे आत्मामां रह्या अनंतगुण. ते अनंतगुणस्वरूप भगवान आत्मा ए पण एकरूप छे. अने तेना सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप त्रण परिणामथी जुओ तो ए व्यवहार छे. त्रिकाळी एकरूप जुओ तो निश्चय छे, अने त्रणरूप जुओ तो व्यवहार छे. अभेदथी जुओ तो अमेचक-निर्मळ छे अने भेदथी जुओ तो मेचक-मलिन छे. एकरूप जुओ तो एकाकार छे अने त्रणरूप पर्यायथी जुओ तो अनेकाकार छे. आत्माने गुण- गुणीना भेदथी जुओ तो ए अनेकाकार छे, व्यवहार छे, मलिन छे, आश्रय करवा लायक नथी. त्रण प्रकारना दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप परिणाम पण आश्रय करवा लायक नथी.

अहो....! आत्मा एकस्वरूपी, ज्ञायक चिद्घन चैतन्यस्वभावनो भंडार सूर्य ए एकरूप निश्चयनयनो विषय छे. ते एकरूप अभेद निर्मळ छे तोपण एनी दर्शन-ज्ञान- चारित्रनी परिणति जुओ तो व्यवहारथी द्वन्द्व छे, त्रण स्वभावरूप छे. एकरूप स्वभाव त्रण स्वभावरूप थयो ए व्यवहार छे. अहीं शुभराग ए व्यवहार ते वात नथी.

पुण्य-पाप अधिकार गाथा १४प मां कह्युं छेः-

छे कर्म अशुभ कुशील ने जाणो सुशील शुभकर्मने!
ते केम होय सुशील जे संसारमां दाखल करे?

शुभने-पुण्यने भलुं केम कहीए के जे संसारमां दाखल करे? ए भलुं नथी, सारुं नथी, (आदरणीय नथी) केमके शुभभाव ए संसार छे, मलिन छे. निश्चयथी तो पुण्यना भावने पाप कहेल छे. योगीन्दुदेवकृत योगसार गाथा ७१ मां कह्युं छे केः-

पापरूपने पाप तो जाणे जग सहु कोई,
पुण्यतत्त्व पण पाप छे कहे अनुभवी बुध कोई.

अनुभवी सम्यग्द्रष्टि तो पुण्यने पण पाप कहे छे. अहीं आचार्य महाराज कहे छे के निश्चयनयनी अपेक्षाए व्यवहाररत्नत्रय (पुण्यभाव) ए पाप छे, राग छे, मलिन छे, बंध छे, संसार छे. अहाहा....! आकरी वात, बापा! वीतरागनो मार्ग वीतरागभावथी उत्पन्न थाय छे, रागथी उत्पन्न थतो नथी.

समयसार पुण्य-पाप अधिकारमां जयसेनाचार्यनी टीका गाथा १६३ मां आवे छे केः-

[(गाथा १प४ सुधी पुण्य अधिकार पूरो करी गाथा १पप थी पाप अधिकार शरू थाय छे. त्यां) शिष्यनो प्रश्न छे के जीवादिनुं श्रद्धान इत्यादि व्यवहाररत्नत्रयनुं व्याख्यान पाप अधिकारमां केम लीधुं? तेना उत्तरमां खुलासो करे छेः-

जोके व्यवहार मोक्षमार्ग (देव-शास्त्र-गुरुनी श्रद्धा आदि तथा पंचमहाव्रतना परिणाम)ने उपादेयभूत निश्चयरत्नत्रयनुं व्यवहारथी कारण कहेवामां आव्युं तथा तेने