१६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ परंपराए जीवनी पवित्रतानुं कारण होवाथी (व्यवहारे) पवित्र कहेवामां आवेल छे तोपण एकस्वरूप भगवान आत्माना अवलंबनने छोडीने रागनुं अवलंबन ले छे माटे पुण्य ए पण परमार्थे पाप ज छे. तेनुं एक कारणः-शुभ परिणामनुं परद्रव्यना आलंबनरूप पराधीनपणुं छे. बीजुं कारणः-निर्विकल्प समाधिमां लीन (योगीओने) आत्मस्वरूपमांथी पडवामां व्यवहार विकल्पोनुं आलंबन (गुण-गुणीना भेदरूप आत्मस्वरूपनुं चिंतवन अथवा द्रव्य-गुण-पर्यायनुं भेदरूप चिंतवन) कारण छे. व्यवहाररत्नत्रयनो विकल्प आव्यो एटले निश्चयरत्नत्रयथी पडी गयो. आ रीते निश्चयनयनी अपेक्षाए पुण्य ए पाप छे. एटले व्यवहारथी जेने पुण्य कहेवाय छे ते निश्चयथी (खरेखर) पाप छे.] [जयसेनाचार्यनी गाथा १६३ नी टीका.]
अहीं कहे छे के आत्मा एक छे तोपण व्यवहारद्रष्टिथी देखवामां आवे तो त्रण स्वभावपणाने लीधे अनेकाकाररूप छे, मेचक छे. आवो वीतराग मार्ग लोकोने सांभळवा पण मळतो नथी. अरेरे! अनादिथी जीव सम्यक् प्रतीति विना, अनुभव विना चार गतिमां रखडे छे.
भगवान अमृतचंद्राचार्यनो आ मूळ श्लोक छे. तेओ मुनि हता. पंच परमेष्ठी छे ने? ते पंचपरमेष्ठीमां आचार्य भगवान थई गया!!
जयचंद पंडिते पण भावार्थ केवो (सरस) लीधो छे. जुओः-‘शुद्धद्रव्यार्थिकनये आत्मा एक छे.’ शुद्ध द्रव्य जेनुं अर्थ एटले प्रयोजन छे ए शुद्धद्रव्यार्थिकनय. ‘शुद्ध’ एटले त्रिकाळ पवित्र अने ‘द्रव्य’ एटले त्रिकाळी अंखड वस्तु अने ‘आर्थिक’ एटले प्रयोजन जेनुं छे ते-ते शुद्धद्रव्यार्थिकनयथी आत्मा एक छे; जे सम्यग्दर्शननो विषय छे, तेने शुद्धद्रव्यार्थिकनय बतावे छे.
हवे कहे छे के ‘आ नयने प्रधान करी आत्माने अभेद एकरूप कहेवामां आवे त्यारे पर्यायार्थिकनय गौण थयो.’ सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी वीतरागी परिणति ए पर्याय होवाथी गौण थई. व्यवहाररत्नत्रयनी तो अहीं वात ज नथी, ए तो बंधनुं कारण छे. पण अहीं तो भगवान आत्मा जे त्रिकाळ शुद्ध एकस्वरूपी छे तेनी ज्ञान- चारित्रनी निर्मळ पर्याय जे साचो मोक्षमार्ग ते पण पर्यायार्थिकनयनो विषय होवाथी गौण थाय छे, अभाव नहीं. अहाहा! शरीर, मन, वाणी तो एक बाजु रह्या केमके ए तो जड धूळ छे; पुण्य-पापना भाव पण एक बाजु रह्या केमके ए मलिन छे; संसार छे; पण अहीं तो जे त्रिकाळी भगवान एकरूप प्रभु तेनां प्रतीति, ज्ञान अने चारित्र-साचा हो-(शुद्ध रत्नत्रय) तेमने पण जे शुद्ध द्रव्यार्थिकनयनो विषय एकरूप