Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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गाथा-१६] [ १७ त्रिकाळी स्वभाव छे तेनी अपेक्षाओ, पर्याय होवाथी पर्यायार्थिकनयनो-व्यवहारनयनो विषय होवाथी मेचक-मलिन कह्यां छे.

प्रवचनसारमां ४६ मा अशुद्धनयमां एम कह्युं के वस्तुने पर्यायथी जाणे ए अशुद्धनय छे. जेम माटीने वासणनी पर्यायथी जोवी ए अशुद्धनय छे अने माटीने माटीरूपे जोवी ए शुद्धनय छे; तेम भगवान आत्माने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी निर्मळ पर्यायथी जोवो ए अशुद्ध छे. एने अहीं मलिन, व्यवहार अने अनेकाकार कहेल छे, कारण के दर्शन, ज्ञान अने चारित्र-त्रणेनो स्वभाव जुदो जुदो छे अने भगवान आत्मानो स्वभाव एकरूप छे. अहाहा! आ तो वीतराग मार्ग छे, बापु! जेने (वाणीने) इन्द्रो अने गणधरो सांभळे अने जे वाणी अंतरमां आत्माने बतावे ते केवी होय? (अद्भुत असाधारण होय) भाई! अहीं भगवाननी ए वाणीनी आ वात छे के वस्तु एक ज्ञायक-ज्ञायक-ज्ञायकमात्र एकस्वभावी छे तेने एकस्वभावीनी द्रष्टिथी जुओ तो ए निश्चय छे, एकस्वभावी छे, निर्मळ छे, अभेद छे. ए वस्तुनुं वास्तविक स्वरूप छे. अने तेने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी परिणतिथी जुओ तो ए अनेकाकार छे, मलिन छे, भेद छे, व्यवहार छे.

हवे कहे छे-‘तेथी एकने त्रणरूप परिणमतो कहेवो ते व्यवहार थयो, असत्यार्थ पण थयो.’ केमके ११मी गाथामां त्रिकाळी ज्ञायकने सत्यार्थ कह्यो छे. ११ मी गाथा तो जैनदर्शननो प्राण छे. ववहारोऽभूयत्थो...” पर्यायमात्र असत्यार्थ छे. वळी केटलाक एम कहे छे के अभूतार्थने असत्यार्थ न कहो, “जयसेनाचार्ये पण अभूतनो अर्थ असत्यार्थ कर्यो छे. अरे! माणस पोतानी द्रष्टि पोषवा माटे साराय शास्त्रना अर्थ बदली नाखे छे. परंतु वस्तु तो जेवी छे तेवी ज रहेशे. भले तमे बदलाई जाओ, पण वस्तु नहि बदलाई जाय. आचार्य भगवान कहे छे के (११ मी गाथामां) भूयत्थो देसिदो दु सुद्धणओ त्रिकाळी एकरूप जे चीज ते सत्यार्थ छे. तेने त्रणरूप परिणमन करतो कहेवो ए व्यवहार थयो. ए त्रिकाळीनी अपेक्षाए त्रिकाळ टक्ती चीज नथी तेथी गौण करीने असत्यार्थ कहेवामां आव्यो छे.

समयसार कळशटीकाकार पंडित राजमलजी पांडेए १६ मा कळशमां लीधुं छे के आत्मा मेचकः (आत्मा) चेतन द्रव्य (मेचक) मलिन छे. कोनी अपेक्षाए मलिन छे? दर्शन–ज्ञान–चारित्रैस्त्रित्वात् सामान्यपणे अर्थग्राहकशक्तिनुं नाम दर्शन छे, विशेषपणे अर्थ-ग्राहकशक्तिनुं नाम ज्ञान छे अने शुद्धत्वशक्तिनुं नाम चारित्र छे-आम शक्तिभेद करतां एक जीव त्रण प्रकारे थाय छे, तेथी मलिन कहेवानो व्यवहार छे.”

पंडित बनारसीदासे पंडित राजमलजी पांडेनी कळशटीका उपरथी समयसार नाटक