१८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ बनाव्युं छे. तेमां १९ मो श्लोक हवे आवशे. तेना उपरथी (जीवद्वार) २० मा छंदमां कह्युं छे केः-
समल विमल न विचारिये, यहै सिद्धि नहि और.”
(एक देखिये जानिये) एटले एक वस्तु त्रिकाळ भगवान पूर्णानंदने अवलोकवो, ते एकने जाणवो, (रमि रहिये इक ठौर) अने ते एक स्थानमां रमणता करवी. (समल विमल न विचारिये) निश्चयथी अभेद अने व्यवहारथी भेद एवो विकल्प करवो नहीं. (यहै सिद्धि नहि और) आ मुक्तिना उपायनी रीत छे. बीजी कोई रीत नथी. हजु तो ज्ञाननां ठेकाणां न मळे तेने श्रद्धा अने ज्ञान सम्यक् कयांथी थाय?
हवे परमार्थ नयथी कहे छेः-
अहाहा! शुं कळश! अमृतथी भरेलो छे. अमृतचंद्राचार्य १००० वर्ष पहेलां थया अने तेना १००० वर्ष पहेलां एटले आजथी र००० वर्ष पहेलां कुंदकुंदाचार्य थया. मद्रासनी आ बाजु ८० माईल दूर वंदेवास गाम छे. १०, ००० नी वस्तीवाळुं छे. त्यांथी पांच माईल दूर पोन्नूर हील नामनी टेकरी छे. त्यां कुंदकुंदाचार्य रहेता हता. तेओ आत्मानुभवी भावलिंगी मुनि हता. त्यांथी पूर्व विदेहक्षेत्रमां सीमंधर भगवान पासे गया हता. अने त्यांथी आवीने आ शास्त्रो रच्यां छे. आ साक्षात् भगवाननी वाणी छे. भाई! आ वाणी बीजे कयांय नथी. एनी (समयसार शास्त्रनी) टीका करनार अमृतचंद्राचार्य १००० वर्ष पछी पाकया. ते भावलिंगी दिगंबर संत मुनि हता. जाणे चालता सिद्ध! अंतर-आनंदनो ढगलो! अंदर अतीन्द्रिय आनंदनो प्रवाह वहेतो हतो. तेमणे आ टीका बनावी छे.
कहे छेः-‘परमार्थेन तु’ शुद्ध एक अभेद आत्मा जेनो विषय छे एवा शुद्ध निश्चयनयथी जोवामां आवे तो ‘व्यक्तज्ञातृत्व–ज्योतिषा’ प्रगट ज्ञायक्ताज्योतिमात्रथी ‘एककः’ आत्मा एकस्वरूप छे. ज्ञान-ज्ञान-ज्ञान ए ज्ञानसूर्य चैतन्यनी झळहळ ज्योति छे. अहाहा! भाषा जुओ. आत्मा प्रगट ज्ञायक्ता ज्योतिमात्र छे. अहीं ‘व्यक्त’ शब्द छे ने? भगवान आत्माने व्यक्त-प्रगट कह्यो छे. ४९ मी गाथामां भगवान आत्माने अव्यक्त कह्यो छे. त्यां तो पर्यायने व्यक्त कही ए अपेक्षाए त्रिकाळीने अव्यक्त कह्यो, परंतु अहीं त्रिकाळी वस्तु व्यक्त-प्रगट ज छे एम कहे छे.
त्यां गाथा ४९ मां अव्यक्त कह्यो. अहीं कहे छे के आत्मा प्रगट-व्यक्त छे. वस्तु प्रगट चैतन्यज्योत छे. प्रगट केवी छे? तो ज्ञायक्ता ज्योतिमात्र एटले चैतन्य ज्ञायकस्वभाव