गाथा-१६] [ १९ ज्योति छे. हवे ‘एककः’ एटले एकस्वरूप ‘एक एव’ एक ज एम अर्थ कर्यो छे, त्रिकाळी वस्तु एकरूप छे. ते शुद्ध द्रव्यार्थिकनयनो विषय छे. वळी ए ज सम्यग्दर्शननो विषय छे. विषय करनारी तो पर्याय छे, पण तेनो विषय एकरूप छे. ध्येय तो त्रिकाळ वस्तु एकरूप छे.
अन्य द्रव्यना स्वभावो तथा अन्यना निमित्तथी थता विभावोने दूर करवारूप तेनो स्वभाव छे.’ शुद्ध द्रव्यार्थिकनयथी त्रिकाळी जे ज्ञायकस्वभाव, तेनां द्रष्टि अने ज्ञान करवाथी अन्य द्रव्यना स्वभावो-शरीर, मन, वाणी अने अन्यना निमित्तथी थता विभावो-पुण्यपापना भावोने दूर करवानो तेनो स्वभाव छे. आ व्यवहारथी कथन छे. निश्चयथी तो शुद्ध चैतन्यघन स्वभावनां प्रतीति, ज्ञान अने एकाग्रता थतां विभाव उत्पन्न ज थतो नथी एटले विभावनो नाश करे छे एम कहेवामां आव्युं छे. त्रिकाळी ज्ञायक एकरूप भावमां अन्य द्रव्योनो अभाव छे तथा विभावनो अभाव करवानी ताकात छे. भावान्तर एटले ज्ञायकभावथी अन्यभावो-विभावोनो ध्वंस कहेतां नाश करवानो एनो स्वभाव छे.
ज्ञायकभावनो विभावने उत्पन्न करवानो तो स्वभाव नथी कारण के तेमां एवो कोई गुण नथी के जे विकार उत्पन्न करे. जो विकार उत्पन्न करे एवी कोई शक्ति होय तो विकारनो नाश थई सिद्धपणुं थई शके नहि. ३४ मी गाथामां आवे छे के ‘आत्मा रागनो नाश करनारो छे’ ए पण यथार्थ नथी, कथनमात्र छे. परमार्थे रागना त्यागनुं र्क्तापणुं आत्माने नथी, पोते तो ज्ञानस्वभाव छे. ३२० मी गाथामां पण आवे छे के ज्ञायकभाव कर्मोदय, निर्जरा, बंध अने मोक्षने जाणे छे, पण करतो नथी. केम? ‘अमेचकः’ ते अमेचक छे-शुद्ध एकाकार छे. त्रिकाळी चैतन्यस्वभाव राग उत्पन्न करे के रागनी रक्षा करे एवो तेनो स्वभाव ज नथी, तेथी अमेचक छे. भेदद्रष्टिने गौण करीने अभेदद्रष्टिथी जुए तो आत्मा एकाकार-एकरूप ज छे, ए ज अमेचक छे, ए ज निर्मळ छे. ए ज पवित्र भगवान आत्मा एकरूप छे. आवी द्रष्टि करे तो सम्यग्दर्शन थाय छे.
आत्माने प्रमाण-नयथी मेचक, अमेचक कह्यो, ते चिंताने मटाडी जेम साध्यनी सिद्धि थाय तेम करवुं एम हवे कहे छेः-
‘आत्मनः मेचकामेचकत्वयोः’ ‘आ आत्मा मेचक छे-भेदरूप अनेकाकार छे तथा अमेचक छे-अभेदरूप एकाकार छे.’ शुं कहे छे? के आत्मा अखंड ज्ञायकभाव एकरूप वस्तु ए तो निश्चयद्रष्टि छे अने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनुं पर्यायमां निर्विकारी परिणमन थवुं ए व्यवहारनयनो विषय छे. व्यवहाररत्नत्रयनी (महाव्रतादि शुभरागनी) वात अहीं छे ज नहीं. ए प्रमाणे आत्मा मेचक-अमेचक कह्यो.