२० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२
अहीं पहेलां तो एम कह्युं के एकरूप वस्तु जे ज्ञायकभाव एनी सेवा करवी एटले के एक आत्माने सेववो ए निश्चय अने शुद्ध रत्नत्रयरूप पर्यायने सेववी (एम कहेवुं) ए व्यवहार छे. आत्मा मेचक छे एवो जे विकल्प र्क्ताकर्म अधिकारमां १४२ गाथा पछी २० कळशोमां (७० थी ८९) जे कह्युं के आत्मा निश्चयनयथी (एटले त्रिकाळी शक्तिरूपे) अबद्ध छे, शुद्ध छे, एक छे, पवित्र छे, अभेद छे-ए वस्तु तो एम ज छे, पण अबद्ध-शुद्ध,.. ..इत्यादि छे एवो जे विकल्प-ते विकल्प करवो ए वात अहीं नथी लीधी पण एनो विकल्प छोडवो एम अहीं कहे छे. एटले विकल्प छूटतां अभेदरूप शुद्ध परिणमन थवुं ए निर्विकल्प परिणमननी वात छे; तेने अहीं व्यवहार कह्यो छे.
आत्मा अमेचक कह्यो छे. ए निर्मळपणाने, अभेदपणाने, एकपणाने, शुद्धपणाने निर्मळ (अमेचक) कह्यो छे. ए विकल्प विनानी निर्मळतानी वात करी. अने पर्यायमां जे निश्चय मोक्षमार्गनुं त्रणपणे परिणमन-एमां एक प्रतीतिरूपभाव, एक जाणवारूपभाव, एक स्थिरतारूपभाव-एम त्रण स्वभाव भिन्न कह्या, त्रण थया एटले अनेकाकार थया. तेथी ए अशुद्ध कहेवामां आवे छे. त्रणपणानुं लक्ष करवुं ए अशुद्धता छे, अने त्रिकाळी एकाकारनुं लक्ष करवुं एनुं नाम शुद्धता छे.
अहीं तो लोकोमां हजी बधा वांधा व्यवहार (शुभरागरूप दया, दान, भक्ति, व्रतादि)ना पडया छे. एने साधन कहो, नहीं तो एकांत थई जाय छे एम केटलाक कहे छे. भाई, ए साधन तो असद्भूत व्यवहारनयथी कह्युं छे. शुं कह्युं ए? के “निश्चय साध्य अने व्यवहार साधक” एम पण पंचास्तिकाय गाथा १७२ मां आवे छे. त्यां तो प्रज्ञा-छीणीथी रागने अने आत्माने भिन्न पाडी अने प्रज्ञाछीणी द्वारा जेणे भगवान आत्माने साधकपणे परिणमाव्यो तेने ते काळे रागनी मंदता केवी होय ए बताववा एने व्यवहार साधननो आरोप आप्यो छे. समजाणुं कांई? साधननुं कथन बे प्रकारे छे, साधन बे प्रकारे नथी. मोक्षमार्गनुं निरूपण (कथन) बे प्रकारे छे, पण निश्चय अने व्यवहार एम बे मोक्षमार्ग नथी.
ए सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप निश्चय मोक्षमार्गनुं साचुं परिणमन जे सत्य व्यवहार छे तेनी अहीं वात छे. वस्तु आत्मा निर्मळ एकाकार तेने त्रणरूपे-एक प्रतीतिरूपे, एक जाणवारूपे अने एक स्थिरतारूपे-एम त्रणस्वभावपणे कहेवो ए मेचक छे अने वस्तु एकस्वभाव अमेचक छे. आम आत्माने मेचक-अमेचक कह्यो खरो तथा अमेचकने शुद्ध आदरणीय कह्यो छे. पण हवे कहे छे आ (वस्तु) अमेचक निर्मळ शुद्ध छे अने आ पर्याय-भेद मेचक-मलिन छे एवो विकल्प छोडी दे. राजमलजीए कळशटीकामां एम लीधुं छे के “श्रुतज्ञानथी आत्मस्वरूप विचारतां घणां विकल्पो ऊपजे