Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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गाथा-१६] [ २१ छे.” आगळ पाछुं गाथा १४३ नी जेम कळशटीकामां लीधुं के-“एक पक्षथी विचारतां आत्मा अनेकरूप छे, बीजा पक्षथी विचारतां आत्मा अभेदरूप छे-आम विचारतां थकां तो स्वरूप अनुभव नथी.” एटले हवे अहीं कहे छे के आत्मा मेचक छे, अमेचक छे एवी चिंतया एव अलम्’ चिंताथी बस थाओ. बनारसीदासकृत समयसार नाटकमां आ १९ मा कळशना हिंदीमां “एक देखिये जानिये......” छंदमां आ वात गई काले १८ मा कळशना प्रवचनमां आवी गई छे. आ द्रव्यस्वभाव अने आ पर्यायस्वभाव, आ अमेचक अने आ मेचक, आ शुद्ध अने आ अशुद्ध, आ अभेद अने आ भेदरूप एवा विकल्पो करवा छोडी दे. आवा विकल्पमां रहेवाथी कांई आत्मज्ञान नहीं थाय, अनुभव नहीं थाय. अनुभवमां ए विकल्पने कांई अवकाश नथी. माटे एवी चिंताथी बस थाओ.

हवे कहे छे के साध्य–सिद्धिः साध्य नाम मोक्षनी पर्यायने साधवी, तेनी

सिद्धि तो ‘दर्शनज्ञानचारित्रैः’ दर्शन-ज्ञान-चारित्रथी ज छे. आ तो त्रण भेदथी समजाव्युं छे. बाकी आश्रय तो एकनो ज करवानो छे. त्रणनुं सेवन एम नथी, सेवन तो एक आत्मानुं ज छे. पाठमां (१६ मी गाथामां) तो एम छे के दंसणणाणचरित्ताणि सेविदव्वाणि एटले पर्यायनी सेवा करवी. ए तो व्यवहारी लोको पर्यायना भेदथी समजे छे तेथी अहीं दर्शन-ज्ञान-चारित्रना भेदथी समजाव्युं छे. सेवना त्रणनी नथी, सेवना एकनी (अखंड एकरूप ज्ञायकनी) छे. अहाहा! आवो मार्ग! समजाय छे कांई? दर्शन-ज्ञान-चारित्र ए त्रणथी ज सिद्धि छे. जोयुं? त्रण भाव कह्या ने? बीजी रीते नथी. एमां अनेरा द्रव्योने सहारो नथी, एक स्वद्रव्यनो ज सहारो छे. एमां त्रण भेद पडया, पण परद्रव्यनो कोई सहारो नथी. देव-शास्त्र-गुरुनी मदद के भक्तिनो विकल्प ए सहारो मोक्षमार्गमां छे ज नहि. आवो अर्थ, भारे कठण पडे माणसने, पण शुं थाय? न च अन्यथा आ अनेकान्त कर्युं. आनाथी थाय अने आनाथी पण थाय एम अनेकान्त नथी. पण वस्तुस्वरूप जे छे तेनी सेवना करतां ए त्रण पर्याय उत्पन्न थाय छे. एने भेदथी समजाव्युं के त्रणनी सेवा करवी, एनाथी सिद्धि छे, बीजी रीते सिद्धि नथी. अने एनो सरवाळो तो ए ज छे के एकाकार आत्मानी सेवा करवी.

* कळश १९ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

१६, १७, १८ आ त्रण कळशो बहु ऊंचा हता. काले घणी वात आवी गई हती. हवे आजे अहीं भावार्थमां कहे छे के ‘आ आत्माना शुद्ध स्वभावनी साक्षात् प्राप्ति अथवा सर्वथा मोक्ष ते साध्य छे.’ साध्य छे, ध्येय नहीं. ध्येय तो त्रिकाळी एकरूप ज्ञायकभाव छे. अहीं प्रगट करवानी अपेक्षाए केवळज्ञाननी मोक्षपर्यायने साध्य कही. साक्षात् प्राप्ति एटले आत्मानी उपलब्धि. जेवा स्वभावे आत्मा छे तेवा (परिपूर्ण) स्वभावनी पर्यायमां प्राप्ति ते आत्मोपलब्धि छे, ए मोक्ष छे, साध्य छे.