Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२

आत्मा मेचक छे के अमेचक छे-एटले के त्रण पर्यायरूपे परिणमेलो छे के एकरूप छे एवा विचारो ज कर्या करवाथी साध्य सिद्ध थतुं नथी. आत्मा पर्यायमां त्रण प्रकारे परिणमेलो छे एवा भेदरूप विचारो अनेकाकारपणुं छे, अशुद्धपणुं छे. अने त्रिकाळी वस्तु अभेद छे, एकस्वभावी छे, अमेचक छे, निर्मळ-शुद्ध छे एवो विचार पण भेदविकल्प छे. तेथी एवा विचारमात्र कर्या करवाथी साध्य सिद्ध थतुं नथी. एटले के केवळज्ञाननी प्राप्ति अर्थात् जेवो आत्मा छे तेवी पर्यायमां उपलब्धि-प्राप्ति आवा विचारोथी थती नथी. परंतु दर्शन अर्थात् शुद्ध स्वभावनुं अवलोकन अने प्रतीति (बन्ने भाव), ज्ञान अर्थात् शुद्ध स्वभावनुं प्रत्यक्ष जाणपणुं, अने चारित्र अर्थात् शुद्ध स्वभावमां स्थिरता-तेमनाथी ज साध्यनी सिद्धि थाय छे.

दर्शन एटले त्रिकाळी शुद्ध स्वभावनुं अवलोकन. एमां श्रद्धा अने देखवुं बन्ने भाव आव्या. ज्ञान एटले शुद्ध स्वभावनुं प्रत्यक्ष जाणपणुं. एमां स्वसंवेदनज्ञाननी वात छे. स्व कहेतां पोताथी, सम् नाम प्रत्यक्ष वेदन. स्वसंवेदन एटले पोताथी पोताने प्रत्यक्ष वेदवुं. एनुं ज नाम सम्यग्ज्ञान छे. शास्त्रज्ञान अने बीजा (बाह्य) ज्ञाननी अहीं वात नथी. व्यवहारज्ञान, शास्त्रनुं विकल्पवाळुं बहारनुं ज्ञान ए कांई सम्यग्ज्ञान नथी. फक्त भगवान आत्मा शुद्ध एकस्वभावी छे तेनुं पर्यायमां स्वसंवेदन एनुं नाम सम्यग्ज्ञान छे. अने चारित्र? कह्युं छे ने के “एक देखिये जानिये रमि रहिये इक ठौर”-ठौर एटले स्थान. जे वस्तु अखंड अभेद छे एने देखवी, जाणवी अने एमां ज विश्राम लेवो. अहाहा! शुद्ध स्वभावमां ध्रुव, ध्रुव धाममां स्थिरता-विश्राम-विश्राम-विश्राम ते चारित्र छे. तेमनाथी ज साध्यनी सिद्धि थाय छे. जुओ ‘ज’ शब्द लीधो छे. आनाथी थाय अने व्यवहारथी पण थाय एम अहीं ना लीधुं. एकान्त कह्युं के तेमनाथी ज साध्यनी सिद्धि थाय छे.

हवे कहे छे के-आ ज मोक्षमार्ग छे. त्रिकाळी भगवान एकरूपस्वभावनां द्रष्टि, ज्ञान अने एमां रमणता ते एक ज मोक्षमार्ग छे. मोक्षमार्ग बे नथी. पंडित श्री टोडरमलजीए कह्युं छे के मोक्षमार्गनुं निरूपण बे प्रकारे छे, मोक्षमार्ग बे प्रकारे नथी. जे स्वना आश्रये थाय ते एक ज मोक्षमार्ग छे. अत्यारना कोई पंडित कहे छे के बे मोक्षमार्ग न माने ए भ्रममां छे. पूर्वना पंडित टोडरमलजी कहे छे के बे मोक्षमार्ग माने ए भ्रममां छे. वळी हालना कोई पंडित एम कहे छे के-“व्यवहारथी न थाय एम न कहेवुं, एम कहेतां निश्चयाभास थई जाय छे.” अहीं कहे छे के त्रिकाळी एकरूप आत्मानी सेवा करतां पर्यायमां त्रण प्रकार पडे तेने व्यवहार कहे छे. प्रवचनसार, ज्ञेय अधिकार, गाथा ९४ नी टीकामां कह्युं छे के-जे त्रिकाळी भगवान आत्मानी श्रद्धा-ज्ञान- चारित्रनी वीतरागी पर्याय एने आत्मव्यवहार कहीए अने रागादिनो व्यवहार ए मनुष्यव्यवहार छे. दया, दान, व्रत अने भक्तिनो विकल्प ए मनुष्यनो मानसिक व्यवहार छे, एनाथी संसार थशे. समजाय छे कांई?