Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 304 of 4199

 

गाथा-१६] [ २३

आत्मा ज्ञायकस्वभाव एकरूप वस्तुनी सेवना करवाथी जे निश्चय सम्यग्दर्शन- ज्ञान-चारित्र प्रगट थाय तेने सत्य-भूतार्थ मोक्षमार्ग कह्यो छे, अने रागादि (क्रियाकांड) ने बंध अधिकारमां अभूतार्थ मोक्षमार्ग कह्यो छे. ११ मी गाथामां भगवान भूतार्थ वस्तु जे कही छे ए भूतार्थनां द्रष्टि-ज्ञान-चारित्र ए पर्यायमां भूतार्थ (मोक्षमार्ग) छे. ११ मी गाथामां जे भूतार्थ कह्यो ते द्रव्य-वस्तु भूतार्थ कही. त्यां त्रिकाळी वस्तु-पुण्यपाप रहित, परद्रव्यरहित अने एक समयनी व्यक्त पर्यायथी पण रहित-जे ध्रुव वस्तु आत्मा छे तेने मुख्य करीने निश्चय कहीने भूतार्थ-सत्यार्थ कह्यो अने पर्यायने गौण करीने व्यवहार कहीने असत्यार्थ कही.

जे भूतार्थ वस्तु छे तेना आश्रयथी सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप पर्याय परिणमे एने भूतार्थ मोक्षमार्ग कहे छे. ते सत्यार्थ मोक्षमार्ग पण पर्याय छे, माटे व्यवहार छे. आवी वात कयां छे, भाई? ओहो! आ तो परम सत्य वीतरागनो मार्ग! भगवाननी द्रिव्यध्वनि!!

हवे आ ज प्रयोजनने बे गाथाओमां, गाथा १७-१८ मां द्रष्टांतथी कहे छे.