Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 17-18.

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 305 of 4199

 

गाथा १७–१८

हवे, आ ज प्रयोजनने बे गाथाओमां द्रष्टांतथी कहे छेः-

जह णाम को वि पुरिसो रायाणं जाणिऊण सद्दहदि।
तो तं अणुचरदि पुणो अत्थत्थीओ पयत्तेण।। १७ ।।
एवं हि जीवराया णादव्वो तह य सद्दहेदव्वो।
अणुचरिदव्वो य पुणो सो चेव दु मोक्खकामेण।। १८ ।।

यथा नाम कोऽपि पुरुषो राजानं ज्ञात्वा श्रद्दधाति।
ततस्तमनुचरति पुनरर्थार्थिकः प्रयत्नेन।। १७ ।।

एवं हि जीवराजो ज्ञातव्यस्तथैव श्रद्धातव्यः।
अनुचरितव्यश्च पुनः स चैव तु मोक्षकामेन।। १८ ।।

ज्यम पुरुष कोई नृपतिने जाणे, पछी श्रद्धा करे,
पछी यत्नथी धन–अर्थी ए अनुचरण नृपतिनुं करे; १७.

जीवराज एम ज जाणवो, वळी श्रद्धवो पण ए रीते,
एनुं ज करवुं अनुचरण पछी यत्नथी मोक्षार्थीए. १८.

गाथार्थः– [यथा नाम] जेम [कः अपि] कोई [अर्थार्थिकः पुरुषः] धननो अर्थी पुरुष [राजानं] राजाने [ज्ञात्वा] जाणीने [श्रद्दधाति] श्रद्धा करे छे, [ततः पुनः] त्यार बाद [तं प्रयत्नेन अनुचरति] तेनुं प्रयत्नपूर्वक अनुचरण करे छे अर्थात् तेनी सुंदर रीते सेवा करे छे, [एवं हि] एवी ज रीते [मोक्षकामेन] मोक्षनी ईच्छावाळाए [जीवराजः] जीवरूपी राजाने [ज्ञातव्यः] जाणवो, [पुनः च] पछी [तथा एव] रीते ज [श्रद्धातव्यः] तेनुं श्रद्धान करवुं [तु च] अने त्यार बाद [स एव अनुचरितव्यः] तेनुं ज अनुचरण करवुं अर्थात् अनुभव वडे तन्मय थई जवुं.

टीकाः– निश्चयथी जेम कोई धन-अर्थी पुरुष बहु उद्यमथी प्रथम तो राजाने जाणे के आ राजा छे, पछी तेनुं ज श्रद्धान करे के ‘आ अवश्य राजा ज छे, तेनुं सेवन करवाथी अवश्य धननी प्राप्ति थशे’ अने त्यार पछी ज तेनुं ज अनुचरण करे, सेवन करे, आज्ञामां रहे, तेने प्रसन्न करे; तेवी रीते मोक्षार्थी पुरुषे प्रथम तो आत्माने