Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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प्रवचन रत्नाकर भाग-२ ] [ २प

(मालिनी)
कथमपि समुपात्तक्रित्वमप्येकताया
अपतितमिदमात्मज्योतिरुद्गच्छदच्छम्।
सततमनुभवामोऽनन्तचैतन्यचिह्नं
न खलु न खलु यस्मादन्यथा साध्यसिद्धिः।। २० ।।

__________________________________________________ जाणवो, पछी तेनुं ज श्रद्धान करवुं के ‘आ ज आत्मा छे, तेनुं आचरण करवाथी अवश्य कर्मोथी छूटी शकाशे’ अने त्यार पछी तेनुं ज आचरण करवुं-अनुभव वडे तेमां लीन थवुं; कारण के साध्य जे निष्कर्म अवस्थारूप अभेद शुद्धस्वरूप तेनी सिद्धिनी ए रीते उपपत्ति छे, अन्यथा अनुपपत्ति छे (अर्थात् साध्यनी सिद्धि ए रीते थाय छे, बीजी रीते थती नथी).

(ते वात विशेष समजावे छेः-) ज्यारे आत्माने, अनुभवमां आवता जे अनेक पर्यायरूप भेदभावो तेमनी साथे मिश्रितपणुं होवा छतां पण सर्व प्रकारे भेदज्ञानमां प्रवीणपणाथी ‘आ अनुभूति छे ते ज हुं छुं’ एवा आत्मज्ञानथी प्राप्त थतुं, आ आत्मा जेवो जाण्यो तेवो ज छे एवी प्रतीति जेनुं लक्षण छे एवुं, श्रद्धान उद्रय थाय छे त्यारे समस्त अन्यभावोनो भेद थवाथी निःशंक ठरवाने समर्थ थवाने लीधे आत्मानुं आचरण उद्रय थतुं आत्माने साधे छे. आम साध्य आत्मानी सिद्धिनी ए रीते उपपत्ति छे.

परंतु ज्यारे आवो अनुभूतिस्वरूप भगवान आत्मा आबाळगोपाळ सौने सदाकाळ पोते ज अनुभवमां आवतो होवा छतां पण अनादि बंधना वशे पर (द्रव्यो) साथे एकपणाना निश्चयथी मूढ जे अज्ञानी तेने ‘आ अनुभूति छे ते ज हुं छुं’ एवुं आत्मज्ञान उद्रय थतुं नथी अने तेना अभावने लीधे, नहि जाणेलानुं श्रद्धान गधेडानां शिंगडांना श्रद्धान समान होवाथी, श्रद्धान पण उद्रय थतुं नथी त्यारे समस्त अन्यभावोना भेद वडे आत्मामां निःशंक ठरवाना असमर्थपणाने लीधे आत्मानुं आचरण उद्रय नहि थवाथी आत्माने साधतुं नथी. आम साध्य आत्मानी सिद्धिनी अन्यथा अनुपपत्ति छे.

भावार्थः– साध्य आत्मानी सिद्धि दर्शन-ज्ञान-चारित्रथी ज छे, बीजी रीते नथी. कारण केः-पहेलां तो आत्माने जाणे के आ जाणनारो अनुभवमां आवे छे ते हुं छुं. त्यार बाद तेनी प्रतीतिरूप श्रद्धान थाय; विना जाण्ये श्रद्धान कोनुं? पछी समस्त अन्यभावोथी भेद करीने पोतामां स्थिर थाय.-ए प्रमाणे सिद्धि छे. पण जो जाणे ज नहि, तो श्रद्धान पण न थई शके; तो स्थिरता शामां करे? तेथी बीजी रीते सिद्धि नथी एवो निश्चय छे.

हवे आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-