२६ ] [ गाथा-१७-१८
चैतन्य जेनुं चिह्न छे एवी [इदम् आत्मज्योतिः] आ आत्मज्योतिने [सततम् अनुभवामः] अमे निरंतर अनुभवीए छीए [यस्मात्] कारण के [अन्यथा साध्य– सिद्धिः न खलु न खलु] तेना अनुभव विना अन्य रीते साध्य आत्मानी सिद्धि नथी. केवी छे आत्मज्योति? [कथम् अपि समुपात्तक्रित्वम् अपि एकतायाः अपतितम्] जेणे कोई प्रकारे त्रणपणुं अंगीकार कर्युं छे तोपण जे एकपणाथी च्युत थई नथी अने [अच्छम् उद्गच्छत्] जे निर्मळपणे उद्रय पामी रही छे.
तोपण शुद्धद्रव्यद्रष्टिथी जे एकपणाथी रहित नथी थई तथा जे अनंत चैतन्यस्वरूप निर्मळ उदयने प्राप्त थई रही छे एवी आत्मज्योतिनो अमे निरंतर अनुभव करीए छीए. आम कहेवाथी एवो आशय पण जाणवो के जे सम्यग्द्रष्टि पुरुष छे ते, जेवो अमे अनुभव करीए छीए तेवो अनुभव करे. २०.
नथी, तेथी ज्ञानने नित्य सेवे ज छे; तो पछी तेने ज्ञाननी उपासना करवानी शिक्षा केम आपवामां आवे छे? तेनुं समाधानः ते एम नथी. जोके आत्मा ज्ञान साथे तादात्म्यस्वरूप छे तोपण एक क्षणमात्र पण ज्ञानने सेवतो नथी; कारण के स्वयंबुद्धत्व (पोते पोतानी मेळे जाणवुं ते) अथवा बोधितबुद्धत्व (बीजाना जणाववाथी जाणवुं ते) -ए कारणपूर्वक ज्ञाननी उत्पत्ति थाय छे. (कां तो काळलब्धि आवे त्यारे पोते ज जाणी ले अथवा तो कोई उपदेश देनार मळे त्यारे जाणे-जेम सूतेलो पुरुष कां तो पोते ज जागे अथवा तो कोई जगाडे त्यारे जागे.) अहीं फरी पूछे छे के जो एम छे तो जाणवाना कारण पहेलां शुं आत्मा अज्ञानी ज छे केम के तेने सदाय अप्रतिबुद्धपणुं छे? तेनो उत्तरः ए वात एम ज छे, ते अज्ञानी ज छे.
निश्चयथी एटले खरेखर जेम कोई धन-अर्थी-लक्ष्मीनी जरूरियातवाळो पुरुष बहु उद्यमथी प्रथम तो राजाने जाणे. एनां कपडां, शरीर, वैभव, एनो चहेरो, कपाळ वगेरे लक्षणोथी प्रथम जाणे के आ राजा छे. लक्ष्मीवंत छे, उपज घणी छे, शरीरमां पण पुण्य देखाय छे माटे आ राजा छे. पछी तेनी श्रद्धा करे के आ जरूर राजा ज छे, तेनुं सेवन करवाथी जरूर धननी प्राप्ति थशे. त्यार पछी तेनुं अनुचरण करे, एटले एनी आज्ञा प्रमाणे रहे, एनी सेवा करे अने एने प्रसन्न करे. जुओ, आ द्रष्टांत छे. तेवी रीते मोक्षार्थी पुरुषे प्रथम तो आत्माने जाणवो. जुओ, पहेलामां पहेलुं एने करवानुं होय