Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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प्रवचन रत्नाकर भाग-२ ] [ २७ तो भगवान आत्मा केवो छे, केवडो छे, कयां छे, केम छे-एम एने जाणवो. सीधी वात लीधी छे के अंतर स्वसंवेदनज्ञानथी प्रथम आत्माने जाणवो. अहाहा! मोक्षार्थी पुरुषे प्रथम आ करवानुं छे.

द्रष्टांतमां पेलो धनार्थी छे. तो आ मोक्षार्थी छे. एने पूर्णानंदनी प्राप्ति सिवाय बीजुं कांई प्रयोजन नथी. एने पुण्यनी इच्छा नथी, स्वर्गनी के कोई मोटी पदवी मळे एनी इच्छा नथी. एक ज पदवी मोक्षार्थी माटे छे, एक मोक्षनी. (द्रष्टांतमां) जेम पेलो एक धननो ज अर्थी छे एम आ एकलो मोक्षनो ज अर्थी छे. अनंत अनंत आनंदनी पर्यायमां प्राप्ति थाय ए मोक्ष. नियमसारमां आवे छे के आत्माना महा आनंदनो लाभ ते मोक्ष. बस ए मोक्ष जेनुं प्रयोजन छे ते मोक्षार्थी छे. श्रीमदे आत्मसिद्धिमां कह्युं छे केः-

“मोक्ष कह्यो निज शुद्धता, ते पामे ते पंथ,
समजाव्यो संक्षेपमां, सकल मार्ग निर्ग्रंथ.”

श्रीमद् राजचंद्रना आत्मसिद्धि शास्त्रमां पहेला ज छंदमां एम कह्युं छेः-

“जे स्वरूप समज्या विना, पाम्यो दुःख अनंत,
समजाव्युं ते पद नमुं श्री सद्गुरु भगवंत.”

अहीं जे पद समजाव्युं एटले के जे आत्मपद मने समजायुं ते पदने (स्वरूपने) हुं नमुं छुं एम कहे छे. जेवुं स्वरूप छे ते पहेलुं समजायुं. ते पदने हुं नमुं छुं. वळी १६ मा वर्षे “बहु पुण्य केरा....” ए काव्यमां एम कह्युं केः-

“हुं कोण छुं? कयांथी थयो? शुं स्वरूप छे मारुं खरुं?
कोना संबंधे वळगणा छे? राखुं के ए परिहरुं?
एना विचार विवेकपूर्वक शांत भावे जो कर्या,
तो सर्व आत्मिकज्ञानना, सिद्धांततत्त्व अनुभव्या.”

अहीं अमृतचंद्राचार्य महाराज दाखलो आपीने कहे छे के-प्रथम तो आत्माने जाणवो. जाणवो एटले स्वसंवेदनज्ञानथी एने जाणवो. शास्त्रथी जाणवो, धारणाथी जाणवो के गुरुए जणाव्यो तेथी जाणवो एम नहि. पण शुद्ध ज्ञानस्वभावी भगवान आत्माने पर्यायमां ज्ञेय बनावतां जे ज्ञान थाय ए स्वसंवेदनज्ञानथी आत्माने जाणवो. त्यारे आत्माने जाण्यो एम कहेवाय. ज्ञाता द्रव्यनुं पर्यायमां ज्ञान थाय त्यां द्रव्य पर्यायमां आवे नहि, पण पर्यायमां ज्ञाता द्रव्यनुं पूरुं ज्ञान थाय. आत्माने जाणवो एनो अर्थ एम छे के एक समयनी ज्ञानपर्यायमां आ ज्ञेय पूर्ण अखंड ध्रुव शुद्ध प्रभु जेवो छे तेवो परिपूर्ण जणाय त्यारे आत्माने जाण्यो एम कहेवाय. आवी वात