४२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ विकल्पथी हठी निर्विकल्प आनंदनी परिणतिने अमे सेवीए छीए. आ अनुभूति- निर्विकल्प आनंदनी अनुभूति ए धर्म छे, साक्षात् धर्म छे. पण दया, दान, पूजा आदि परंपरा (धर्म) छे एम नथी. परंपरा धर्म कह्यो छे ने? कह्यो छे, पण ए कोने लागु पडे? जेने रागमां धर्म छे एवी मान्यता टळी गई छे अने आत्मानो आनंद छे ए धर्म छे एवी द्रष्टि थई छे एने शुभभाव परंपरा धर्म छे एम लागु पडे छे; केम के एणे अशुभ टाळ्युं छे अने आत्मानी द्रष्टि वडे ए शुभ टाळशे. पण हजी जे शुभभावमां धर्म माने एने तो परंपरा लागु पडती नथी, केम के ए तो मिथ्याद्रष्टि छे. मार्ग जुदा छे, बापा! बहारना बधा डहापणमां गुंचाईने मरी जाय पण अरेरे! बिचाराने आ अंतरना डहापणनी खबर नथी. आचार्यदेवे ए ज कह्युं छे के अमे निरंतर आत्मज्योतिनो अनुभव करीए छीए केम के ए अनुभव विना साध्य आत्मानी सिद्धि नथी.
हवे कहे छे के-‘आम कहेवाथी एवो पण आशय जाणवो के जे सम्यग्द्रष्टि पुरुष छे ते, जेवो अमे अनुभव करीए छीए तेवो अनुभव करे. सम्यग्द्रष्टिने अतींद्रिय आनंदनो कंद प्रभु आत्मा अनुभवमां आव्यो छे अने प्रतीति थई छे. तने कहे छे के- बापु! तारे साध्य जे सिद्धदशा तेनी प्राप्ति करवी होय तो अनुभूतिथी थशे. धवलमां आवे छे के “निरपेक्षनयाः मिथ्याः” एक नय, बीजानी अपेक्षा विना मिथ्या छे. एनो अर्थ ए के रागादिभाव जे छे ए व्यवहारनय छे. एने ए जाणे छे अने एनी उपेक्षा करीने स्वनी अपेक्षामां आवी जाय छे. भाई! आ कांई वादविवादथी पार पडे एवुं नथी. बनारसीदास तो कहे छे के “सद्गुरु कहे सहजका धंधा, वादविवाद करे सो अंधा” आ तो सहजनो धंधो छे. वस्तु सहजानंद सहज स्वभाव छे. आत्मसिद्धिमां आवे छे केः-
आत्मा सहज प्रतीतिरूप स्वभाविक वस्तु अंदर छे. तेनां दर्शन-ज्ञान-चारित्र सहजपणे थाय छे-एमां हठ न होय. आवुं सहजपणुं जे सम्यग्द्रष्टिने श्रद्धा-ज्ञानमां आव्युं छे तेणे आवो अनुभव करवो ए ज मोक्षनो मार्ग छे. आत्माना साध्यनी सिद्धि अनुभवथी थाय छे-कह्युं छे ने केः-(समयसार नाटकमां).
आ भावार्थ थयो.
“हवे, कोई तर्क करे के आत्मा तो ज्ञान साथे तादात्म्यस्वरूपे छे, जुदो नथी,