गाथा १७-१८] [ ४१ छोडी अंदरमां त्रणलोकनो नाथ आनंदकंद भगवान विराजमान छे तेनुं लक्ष करतो नथी तेने आ केम बेसे? जेने एक बे बीडी पीए तो चैन पडे अने तो पायखाने दस्त उतरे आवी तो रांकाई छे तेने आ केम बेसे? जेम हरणनी नाभिमां कस्तूरी छे एनी हरणने खबर नथी; एने एम लागे के आवी गंध बहारथी आवे छे एटले बहारमां रखडे छे. तेम आ परमात्मा अंदर अतीन्द्रिय आनंदनो रसकंद पडयो छे एनी एने खबर नथी एटले बिचारो बहारमां आनंद-सुख माटे फांफां मारे छे.
अहाहा! जेने अतीन्द्रिय आनंदनी एक क्षणमां-सम्यग्दर्शनादि अनुभूतिना स्वादमां इन्द्रना इन्द्रासनो अने इन्द्राणीना भोग सडेलां कूतरां जेवां (तुच्छ, फीका) लागे तेने धर्मी कहीए. आखो दिवस रागनां चूंथणां कर्या करे अने एमां मजा-माणे ए तो मूढ छे. तेने धर्म कयां छे? कदाच पापना परिणाम छोडीने जरा पुण्यभावमां आवे एटले तो जाणे अमे कांईक छीए एम मानवा लागे. लाख बे लाखनुं दान करे अने पत्थरनी तक्तीमां नाम मढावे के फलाणानी स्मृतिमां फलाणाए दान कर्युं, इत्यादि. भाई! आमां तो दया, दानना परिणामनां पण कयां ठेकाणां छे? कदाचित् रागनी मंदताथी दान करे तोपण ए पुण्यभाव छे, धर्म नथी. ए परिणाम दुःख छे, दुःखरूप छे. अने आ पैसाने साचववा अने बायडी-छोकरां-परिवारने पोषवां इत्यादि तो एकला पापना परिणाम छे, तीव्र दुःखरूप छे. आ तो वीतरागनो मार्ग, भाई! अत्यारे तो बधा अधर्मना ढसरडा करीने एम माने के अमे धर्म करीए छीए. पण जन्म- मरणरहित भगवान आत्माना भान विना माथे जन्म-मरणनी डांग ऊभी छे, भाई! मोटा राजा होय ते मरीने नरके जाय अने मोटा करोडपति के अबजोपति शेठिया होय ते मरीने तिर्यंचमां अवतरे-कूतरीनी कूखे गलुडियां थाय के बकरीने पेटे लावरां थाय. माया, कपट आदि क्रियाओना फळ एवां ज होय, बीजुं कांई न होय.
अहाहा! वीतरागदेव परमेश्वर आम कहे छे, नाथ! के द्रव्यद्रष्टिथी एटले वस्तुनी द्रष्टिथी जोईए तो तेनुं एकपणुं कदीय छूटयुं नथी. अने ते एक ज्ञायक भगवान आत्माने-पोताने एकपणे अनुभवीने द्रष्टि ज्ञान अने रमणता करे तेने पर्यायद्रष्टिए त्रणपणुं प्राप्त छे एम जाणवामां आवे छे. बस आटली एनी (सत्तानी) मर्यादा छे. बाकी ए (एनी सत्ता) नथी. दया, दान आदि परिणाममां, शरीर, मन के वाणीमां के कुटुंबादि परमां एनी सत्तानो अंश पण नथी.
हवे कहे छे के द्रव्यद्रष्टिथी जोतां जे कदीय एकपणाथी रहित थई नथी तथा जे अनंत चैतन्यस्वरूप निर्मळ उद्रयने प्राप्त थई रही छे एवी आत्मज्योतिनो अमे निरंतर अनुभव करीए छीए. अहाहा! अविनाशी ज्ञानस्वरूप ए आत्मज्योति निर्मळ प्रकाश वडे पर्यायमां प्रगट थई रही छे. अमे निरंतर एनो अनुभव करीए छीए एटले पुण्य-पापना