४० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२
भाई! सुख शामां छे एनी तने खबर नथी. शुं सुख पैसामां छे? स्त्रीना शरीरमां छे? आबरूमां छे? पुण्य-पापना भाव थाय एमां छे? एमां तो सुख धूळेय (कांई) नथी. अहाहा! सुख तो भगवान आत्मा जे अनाकुळ आनंदना रसथी भरेलो छे एमां छे. आवी निजसत्तानो जेमने स्वीकार ज नथी ते भले कोई पुण्य करे, एथी एने पुण्यना फळमां स्वर्गादि (भव) मळे; पण ए बधा दुःखी छे, चारगतिमां रखडनारा छे. अहीं कहे छे के एवा अतीन्द्रिय आनंदस्वरूप भगवान आत्मानां द्रष्टि, ज्ञान अने रमणता करतां अतीन्द्रिय निराकुळ आनंद-सुखनो जे स्वाद आवे छे ते स्वादमां सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र त्रणे समाय छे. एम सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप निश्चय मोक्षमार्गनुं जे त्रणपणे परिणमन छे ए पर्यायार्थिकनयनो विषय छे.
अत्यारे संप्रदायमां तो अजैनने जैनपणुं मनावी रह्या छे. शुं थाय? भक्तिवाळा एम कहे छे के भगवाननी भक्ति करतां करतां धर्म थाय, दया पाळनारा एम कहे छे के परनी दया पाळतां पाळतां धर्म थाय, पैसावाळा एम कहे छे के पांच पचास लाखनुं दानमां खर्च करीए तो धर्म थाय. ए त्रणे जूठा छे. धर्म तो वस्तुनो स्वभाव छे. कह्युं छे ने के “वत्थु सहावो धम्मो” भगवान आत्मा वस्तु जे त्रिकाळ आनंदघनस्वभावी छे एनी द्रष्टि करीने, एनुं ज्ञान करीने एमां रमणता करवी ए वस्तुनो स्वभावरूप धर्म छे.
जेने आवा धर्मनी द्रष्टि थई छे तेनी परिणतिमां वर्तमान पर्यायद्रष्टिथी जोईए तो त्रणपणुं प्राप्त छे ‘तोपण शुद्ध द्रव्यद्रष्टिथी जे एकपणाथी रहित नथी थई....’ अहाहा! शुद्ध द्रव्यद्रष्टिथी आ त्रिकाळी आनंदकंद प्रभु आत्माने एकपणुं छे ए अज्ञानीने केम बेसे? ज्यां थोडीक अनुकूळता थाय, बहारमां पांच पचास लाखनो संयोग थाय त्यां खुशी खुशी थई जाय ए रांकाने आत्मा आनंदकंद छे ए केम बेसे? पण भाई! आ तो जिनेन्द्रदेव त्रिलोकनाथ सर्वज्ञ तीर्थंकरदेवे एम कह्युं छे के तुं अंदरमां त्रिकाळी एकरूप आनंदस्वरूप ज्ञायक परमात्मतत्त्व छे. शुद्ध द्रव्यद्रष्टिथी जोतां ए एकपणुं, ज्ञायकपणुं कदी छूटयुं नथी. आवो मार्ग कठण पडे, केम के आखो दिवस धंधामां पापमां जाय. ७-८ कलाक ऊंघमां जाय, १०-१२ कलाक धंधामां जाय, २-३ कलाक खावामां जाय अने वखत मळे तो कोईक दिवस एकाद कलाक सांभळवामां जाय. त्यां आवुं सांभळे के व्रत करो, तप करो, उपवासादि करो, तेथी तमने धर्म थशे. अरेरे! बिचारानी जिंदगी लूंटाई जाय छे. अहीं परमात्मा एम कहे छे के ए व्रत, तप, दया, दान, भक्ति आदिना भाव ए रागना अने कषायनी मंदताना भाव ए दुःखना भाव छे.
जेम सक्करकंदमां जे उपर लाल पातळी छाल छे ए काढी नाखो तो बाकीनो आखो सक्करकंद मीठाशनो पिंड छे; एम आ भगवान आत्मामां पुण्य-पापनी वृत्तिओ, दया, दान, व्रत आदि विकल्पो ए छाल छे. एनी पाछळ जुओ तो चैतन्यमूर्ति भगवान आत्मा आखो अतीन्द्रिय आनंदनो कंद छे. पण शरीर अने पुण्य-पापना विकल्पनुं लक्ष