Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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गाथा १७-१८] [ ३९

आचार्य कहे छे के- अनंत चैतन्यचिह्नं अनंत (अविनश्वर) चैतन्य जेनुं

चिह्न छे अर्थात् जाणवुं, जाणवुं, जाणवुं ए जेनुं लक्षण-एंधाण छे एवी इदम् आत्मज्योतिः आ आत्मज्योतिने सततम् अनुभवामः अमे सतत-निरंतर अनुभवीए छीए. अहाहा! समयनो आंतरो पडया विना निरंतर अमे आनंदनो नाथ जे भगवान ज्ञायक आत्मा तेने अनुभवीए छीए. अंदर जे सच्चिदानंद प्रभु अतीन्द्रिय आनंदना स्वभावे शक्तिपणे पडयो छे ते अतीन्द्रिय आनंदस्वरूपने अमे सतत अनुभवीए छीए. जुओ आ आत्मानुं चारित्र. चैतन्यसत्ताथी भरेलो जे ज्ञायकभाव आनंदथी भरेलो भगवान आत्मा एनुं ज्ञान अने श्रद्धान छे, उपरांत आचरणमां अंदर स्थिरता करी एने अनुभवीए छीए. यस्मात् कारण के न खलु न खलु अन्यथा साध्यसिद्धिः तेना अनुभव विना साध्य आत्मानी सिद्धि नथी. भगवान आत्मानुं ज्ञान, एनी सम्यक् श्रद्धा अने एमां ठरवारूप चारित्र ए विना आत्मानी सिद्धि एटले मुक्ति नथी. व्यवहारथी थाय अने निमित्तथी थाय एम नथी.

केवी छे आत्मज्योति? कथम् अपि समुपात्तत्रित्वम् अपि एकतायाः जेणे

कोई प्रकारे त्रणपणुं अंगीकार कर्युं छे तोपण जे एकपणाथी च्युत थई नथी. परिणमननी अपेक्षाए पर्यायमां त्रण पणुं छे तोपण ए चैतन्यज्योति सदा एक ज्ञायकपणे ज रही छे. वळी ते चैतन्यज्योति अच्छम् उद्गच्छत् निर्मळपणे उद्रय पामी रही छे, चैतन्यना प्रकाशथी पर्यायमां निर्मळपणे प्रकाश प्रसरी रह्यो छे.

* कळश २०ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘आचार्य कहे छे के जेने कोई प्रकारे पर्यायद्रष्टिथी त्रणपणुं प्राप्त छे’ः-शुं कहे छे? के आ आत्मा शुद्ध चैतन्यघन त्रिकाळ ध्रुव एकरूप छे ए तो स्वभावनी वात छे, पण एने ए शुद्ध एकरूप चैतन्य आनंदस्वरूपनां प्रतीति-श्रद्धा, ज्ञान अने एमां रमणता एम सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी जे परिणति थाय ते पर्याय अपेक्षाए त्रणपणे परिणमन छे. अहीं पर्यायनुं त्रणपणे परिणमन लीधुं ते सम्यग्दर्शनादिनुं लीधुं, वच्चे जे राग (महाव्रतादिनो) आवे ते लीधुं नहि; केम के दया, दान, भक्ति, पूजा, व्रत, तप वगेरेनो भाव आवे ते राग छे, धर्म नथी, धर्मनुं कारण पण नथी.

प्रश्नः–एने व्यवहारे धर्म कह्यो छे ने?

उत्तरः–व्यवहारे धर्म कह्यो छे, पण कोने? सम्यग्द्रष्टिने. जेने (द्रष्टिमां) रागनो अभाव छे, शुद्ध चैतन्यना आनंदना अमृतनो स्वाद आव्यो छे अने शांति थोडी अंदर वधी छे एवा समक्तिीने जे व्रतादिना विकल्प होय तेने व्यवहारधर्म, पुण्यधर्म कह्यो छे. भाई! आ तो जन्म-मरणरहित थवुं होय एनी वात छे. जेने हजु स्वर्गना अने शेठाईना अने राजा वगेरेना भव करवानी होंश होय एने माटे आ वात नथी. ए भव सारा नथी पण दुःखमय छे.