३८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२
आवो अनुभूतिस्वरूप भगवान छे एनुं जेने ज्ञान ज थतुं नथी तेने श्रद्धा पण थती नथी अने श्रद्धा विना भिन्न पडीने निःशंकपणे स्वरूपमां ठरवारूप आत्मानुं आचरण थतुं नथी. अरेरे! आवुं मनुष्यपणुं मळ्युं एमां सत्यने सांभळ्युं नहि, सत्यनी ओळखाण करी नहि तो ए सत्यमां ठरशे के दि? ए तो रागमां रहेशे. आम आत्मानुं आचरण उद्रय नहि पामवाथी ते आत्माने साधतो नथी. रागनुं आचरण करे एटले शुकल लेश्याना परिणाम वडे नवमी ग्रैवेयक जाय पण आत्माने साधे नहीं. आम साध्य आत्मानी सिद्धिनी अन्यथा अनुपपत्ति छे. साध्य जे ध्येय सिद्धपद अर्थात् पूर्ण पवित्र मोक्षदशा एनी अन्यथा एटले आ सिवाय (आत्मानां ज्ञान-श्रद्धान-आचरण सिवाय) बीजी रीते उपपत्ति-प्राप्ति नथी. अहीं साध्य मोक्षनी पर्यायने ध्येय कह्युं ए तो भविष्यमां प्रगट करवानी अपेक्षाए छे. वर्तमान साधनरूप पर्यायनुं आश्रयरूप ध्येय तो त्रिकाळी शुद्ध ज्ञायकभाव ज छे. बीजानुं (अन्य द्रव्यनुं) करवुं, न करवुं ए आत्माना अधिकारनी वात नथी. आ तो पोते कां तो उंधाई करे वा सवळाई करे एटली वात छे.
‘साध्य आत्मानी सिद्धि दर्शन-ज्ञान-चारित्रथी ज छे, बीजी रीते नथी.’ जुओ, साध्य एवी मोक्षदशानी प्राप्ति निश्चयरत्नत्रयथी छे, व्यवहाररत्नत्रयथी नहीं. व्यवहार सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ए तो विकल्प (राग) छे. शास्त्रनुं व्यवहार ज्ञान अने व्यवहारचारित्र ए विकल्प छे. एनाथी साध्य आत्मानी सिद्धि नथी. केटलाक कहे छे के अनेकान्त करोः एटले के मोक्षनी प्राप्ति निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रथी थाय अने व्यवहारथी पण थाय. परंतु भाई! ए अनेकान्त नथी, ए तो फूदडीवाद छे. निश्चयथी छे अने व्यवहारथी नथी ए अनेकान्त छे.
आम साध्य आत्मानी सिद्धि छे, बीजी रीते नथी कारण के ‘पहेलां तो आत्माने जाणे के आ जाणनारो अनुभवमां आवे छे ते हुं छुं.’ आ जाणनारो जे पर्यायमां जणाय छे ते हुं छुं एम बराबर जाणे त्यारपछी तेनी प्रतीतिरूप श्रद्धान थाय. विना जाण्ये श्रद्धान कोनुं? पछी समस्त अन्यभावोथी-विकल्पमात्रथी भेद करीने पोतामां स्थिर थाय; ए प्रमाणे सिद्धि छे. पण जो जाणे ज नहि अर्थात् आत्मानुं ज्ञान करे ज नहि तो श्रद्धान पण न थई शके; तो स्थिरता शामां करे? तेथी बीजी रीते सिद्धि नथी एम निश्चय छे.
जेम मंदिर करीने उपर कळश चढावे तेम श्री अमृतचंद्राचार्ये टीका उपर पाछो कळश चढाव्यो छेः