गाथा १७-१८] [ ३७ तो संसारनो छेद केम थाय एनी वात छे. अहो! आ समयसार अद्वितीय चक्षु छे, अजोड आंख छे. भरतक्षेत्रनी केवळज्ञाननी आंख छे. भाग्य जगतनुं के आ समयसार रही गयुं.
आ जाणनारो जणाय छे एवा आत्मज्ञानना अभावने लीधे आ जाणनारो ज्ञायक ते ज हुं छुं एवुं श्रद्धान पण उद्रय थतुं नथी. एने समक्ति थतुं नथी. रागमां एकत्वबुद्धिने लीधे नहि जाणेला भगवान ज्ञायकस्वरूप आत्मानुं एने श्रद्धान-समक्ति थतुं नथी. त्यारे समस्त अन्यभावोना भेद वडे आत्मामां निःशंक ठरवामां एने असमर्थपणुं छे. रागथी भिन्न एवुं आत्मज्ञान अने श्रद्धान न थयुं तेथी जेमां ठरवुं छे ए जणायो नहि. तेथी रागथी भिन्न पडी ने आत्मामां ठरवानुं असमर्थपणुं होवाथी ए रागमां ठरशे. मिथ्याद्रष्टि गमे तेटला शुभभावरूप क्रियाकांड करे, मुनिपणुं धारे अने व्रत-नियम पाळे तोपण ए रागमां ठरशे. आत्मज्ञान-श्रद्धान विना ए बधी रागनी रमतोमां रमे छे.
जुओ, त्रणेमां (ज्ञान-श्रद्धान अने आचरण) उद्रय, उद्रय, उद्रय एम कह्युं छे. आत्मज्ञान उद्रय थतुं नथी तेथी तेनुं श्रद्धान पण उद्रय थतुं नथी. एटले आत्मानुं आचरण उद्रय नहि थवाथी आत्माने साधतुं नथी. श्रीमद्मां (आत्मसिद्धिमां) “उद्रय थाय चारित्रनो” ए शब्दो आवे छे. जेमकेः-
ए आ (आत्माना आचरणनो) उद्रय. आ तो व्रत करो, संयम पाळो, चारित्र पाळो तो तमने निश्चय समक्ति थशे एवुं कहेवाय छे. पण अरेरे! रागनी एक्तामां पडयो होय तेथी परिभ्रमणना भाव सेवे अने एनाथी अपरिभ्रमणनी समक्ति दशा प्रगट थाय एम शी रीते बने? न ज बने. भाई आ तो मूळमां ज वांधा छे. एनुं समाधान थई शके नहीं. ए लोको एम कहे छे थोडी छूट अमे मूकीए अने थोडी छूट तमे मूको. एम के थोडुं निमित्तथी थाय, व्यवहारथी थाय अने थोडुं उपादानथी थाय एम समाधान करीए. पण भाई! वीतरागना मार्गमां एम न चाले. “एक होय त्रणकाळमां परमारथनो पंथ.” एमां छूट मूकवानो कयां अवकाश छे? भाई! संतो शुं कहे छे एनी तने खबर नथी. दया, दान आदि रागनो एक कणियो पण आत्माने लाभ करे एम त्रणकाळमां बने नहीं. तथा निमित्त उपादानना कार्यकाळे हाजर होय पण निमित्त (उपादाननुं) कार्य करे छे एम त्रणकाळमां नथी. तो कहे छे-बे कारण आवे छे ने? भाई! बे कारणमां एक (निमित्त) तो औपचारिक-आरोपित कारण कह्युं छे. (ते अनेक प्रकारे होय छे) अने यथार्थ कारण एक (उपादान) ज छे.