३६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ (जो विकार वखते पर-कर्म आदि कोई निमित्त छे ज नहीं एम माने तो एकान्त छे) अहीं कह्युं छे जुओने-“बंधना वशे” एमां केटलो ध्वनि छे?
हुं ज्ञायक छुं. आ जाणनार छे ते ज जणाय छे. जणाय छे ते ज्ञायक वस्तु छे एम ज्ञान न थतां जाणवानी पर्यायमां जे अचेतन राग जणाय छे ते हुं एम माने छे. दया, दान, भक्तिना विकल्प छे ए जड छे. ए ज्ञानमां एने भासतां ए हुं छुं एम माननारने एनाथी रहित हुं आत्मा छुं एवुं ज्ञान प्रगट थतुं नथी. अने ए आत्मज्ञानना अभावमां नहि जाणेलानुं श्रद्धान गधेडाना शिंगडा समान होय छे. जेम मानो के ‘गधेडानां शींगडां’ पण गधेडाने ज्यां शींगडां होय ज नहि त्यां शी रीते मनाय? एम भगवान आत्मा जाणवानी पर्यायमां जणाय ते हुं छुं एम न मानतां राग ते हुं एम माने छे एने आत्मानुं ज्ञान नथी. अने ए आत्मानुं ज्ञान नहि होवाथी तेनी श्रद्धा पण ‘गधेडाना शींगडां’ जेवी छे. भगवाननो मार्ग बहु सूक्ष्म छे, भाई! बहारथी एम कल्पी ले के दया पाळो, व्रत करो अने आ करो ने ते करो, पण भाई! कोण रागनो कर्ता थाय? कर्तापणानी बुद्धि ए तो मिथ्यात्व छे, ज्ञानस्वभावी चैतन्यसूर्य भगवान अचेतन एवा रागने केम करे?
छठ्ठी गाथामां कह्युं ने के ज्ञायकभाव शुभाशुभपणे थयो नथी. ए शुभाशुभभावे थाय तो जड थई जाय, केमके शुभाशुभभावमां चेतननो अंश नथी, पोते पोताने अने परने जाणता नथी. तेथी जो ज्ञायकस्वरूप चैतन्यसूर्य अचेतन एवा शुभाशुभावपणे थाय तो चेतन अचेतन थई जाय. पण एम कदीय बनतुं नथी. अरे! जे आ द्रष्टि- ज्ञाननी पर्याय एमां राग नहि होवा छतां एमां राग छे एवुं जेणे जाण्युं अने मान्युं तथा जे पर्याय ज्ञायकनी छे एमां जे ज्ञायक जणाय ते हुं छुं एम जाणवाने बदले जाणवानी पर्यायमां जे राग जणाय ते हुं छुं एम माननारा आत्मज्ञान विनाना मिथ्याद्रष्टि छे.
आठ आठ वर्षना बाळको सम्यग्दर्शन पामे छे. आठ आठ वर्षना राजकुमारो होय ए वनमां चाली नीकळे. ए अंदरमां (आत्मामां) जवा माटे नीकळे, वनमां जवा माटे नहीं. प्रवचनसार चरणानुयोगमां शरूआतमां आवे छे के ज्यारे आत्मज्ञान थाय छे त्यारे स्त्रीनी पासे रजा मांगे छे. कहे छे केः-हे स्त्री! आ शरीरने रमाडनारी रमणी! हवे मने ज्ञानज्योति प्रगटी छे, एटले हुं मारी अनादि आनंदनी अनुभूतिनी रमणी-जे अनादि वस्तु छे-तेनी पासे जवा मांगुं छुं. माटे ताराथी मारी छूट्टी कर.
अहीं कहे छे के जाणवानी पर्यायमां जे जाणनार जणाय ते हुं एम अंतरमां जवाने बदले बहारमां जे परज्ञेयरूप राग जणाय छे ते हुं एम वश थयो ते अज्ञानी मूढ जीवने आत्मज्ञान थतुं नथी. तेथी आत्माने जाण्या वगर श्रद्धान शी रीते थाय? जे वस्तु ज ख्यालमां आवी नथी एने (आ आत्मा एम) मानवामां शी रीते आवे? भाई! आ