Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 316 of 4199

 

गाथा १७-१८] [ ३प

अरे भाई! तुं दुःखी प्राणी अनादिनो छे. रागने बंधने वश थयो तेथी दुःखी छे ए निराकुळ भगवान आनंदनो नाथ छे. एने पर्यायमां-ज्ञानमां जाणनारो ते पोते छे, एम न जाणतां ज्ञाननी पर्यायमां परने वश थयो थको राग ते हुं एवी मूढता उत्पन्न करे छे. थोडा शब्दोमां मिथ्यात्व केम छे अने सम्यक्त्व केम थाय एनी वात करी छे.

घणा लोको अत्यारे माने छे के कर्मने लईने आम थाय. पण भाई! कर्म तो जड छे. एने लईने शुं होय? कोई कर्म आडे आवतुं नथी. जाणवावाळाने जाणे नहि अने रागने वश पडी एम माने के हुं आ (रागादि), ए तो पोते वश थाय छे. “अपनेको आप भूलके हेरान हो गया.” मूळ सम्यग्दर्शन अने आत्मज्ञाननी वात पडी रही अने मूळ विना (त्यागमां धर्म मानीने) बधां पांदडां तोडयां. जेम आंबलीनां लाखो पान होय ते तोडे पण मूळ साजुं रहे तो ते १प दिवसमां पांगरी जाय. तेम रागनी मंदतानी क्रियाओ अनंतवार करी ए पांदडां तोडयां, राग रहित आत्मा केवो छे तेने जाण्या विना अज्ञानथी मिथ्यात्वनुं मूळ साजुं राख्युं, पण एने उखेडीने सम्यग्दर्शनरूपी धर्मना मूळने पकडयुं नहि.

अहीं कहे छे के आ जाणनार-जाणनार-जाणनार-आ जे जाणनक्रिया द्वारा जणाय छे ते हुं एम अंतरमां न जतां जाणवामां आवे छे जे राग तेने वश थई राग ते हुं एम अज्ञानीए मान्युं तेथी आ अनुभूतिमां जणाय छे ते ज्ञायक हुं एवुं आत्मज्ञान उदय पामतुं नथी. दर्शनमोहना उद्रयने कारणे आ आत्मज्ञान उद्रय पामतुं नथी एम न कह्युं पण रागने वश थवाथी आ जेना अस्तित्वमां-हयातीमां जाणवुं थाय छे ए जाणनार ते हुं एवुं आत्मज्ञान मूढ-अज्ञानीने प्रगट थतुं नथी. कोई माने के कर्मथी थाय, कर्मथी थाय तो ए जूठी वात छे. त्रणकाळमां कर्मथी आत्मानुं कांई न थाय. कर्म ए तो परद्रव्य छे. परद्रव्यथी स्वद्रव्यमां कांई थाय ए वात तद्न जूठी छे. पोते पोताने भूलीने रागने पोतानो माने ए तो मूढभाव छे, मिथ्यात्व छे. तो पछी आ बायडी, छोकरां, कुटुंब, मकान, पैसा, आबरू वगेरे कयांय रही गया. एने पोताना माने ए तो मूढता छे ज.

राग अने आत्मा वच्चे संधि छे, निःसंधि नथी. (आ प्रवचनमां) आ वात आगळ आवी गई छे. त्रणलोकनो नाथ जे सच्चिदानंद प्रभु एनी अने रागनी वच्चे संधि छे, तड छे, पण एक्ता नथी. माणसो बहारथी माथाफोड करे अने जिंदगी काढे, पण शुं थाय? (अंतरंगमां संधि छे, पण एक नथी एम विचारे नहि तो शुं थाय?) एने एकान्त लागे छे पण एकान्त एटले शुं एनी खबर नथी. भाई! जे विकार थाय छे ते ताराथी ज थाय छे, परने लईने-कर्मने लईने के निमित्तने लईने नहि. तुं पोते विकार करे त्यारे तेने (कर्म आदिने) निमित्त कहेवामां आवे छे. आ अनेकान्त छे.