३४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२
हवे आत्मा अने राग वच्चे सांध छे ए वात समजावे छे. (मोक्ष अधिकार, गाथा २९४ मां संधिनी वात छे) ए बंधना वशे पर साथे एकपणाना निश्चयथी- “जाणनार-जाणनार जणाय छे” एम न जाणतां जाणनारनी पर्याय वर्तमान कर्म संबंधने वश थई (स्वतंत्रपणे वश थई) पर साथे-राग अने पुण्यना विकल्पो साथे एकपणानो अध्यास-निर्णय करे छे. हुं राग ज छुं एम माने छे छतां एकपणे थतो नथी. राग अने आत्मा वच्चे संधि छे. (सांध छे.) रागनो विकल्प अने ज्ञानपर्याय ए बे वच्चे संधि छे. जेम मोटा पथ्थरनी खाण होय तेमां पथ्थरमां पीळी, लाल, धोळी रग होय छे. ए बे वच्चे संधि छे. ए पथ्थरोने जुदा पाडवा होय तो ए संधिमां सुरंग नांखे एटले पथरा उडीने जुदा पडी जाय छे. तेम ज्ञानस्वरूपी भगवान आत्मा अने राग बे वच्चे संधि छे. अहाहा! त्यां तो एम कह्युं के निःसंधि थया नथी-एटले बे एक थया नथी. (बे वच्चे संधि होवा छतां बे एक थया नथी). पण (बन्नेना) एकपणाना निश्चयथी मूढ अज्ञानी तेने जे रागनो विकल्प उठे छे अने वश थईने ते हुं छुं एम परपदार्थ जे रागादि तेने पोताना माने छे, परंतु रागथी भिन्न अनुभवरूप पोतानी चीज जुदी छे एनुं भान नहीं होवाथी आ जाणनार जणाय छे ते हुं छुं एम मानतो नथी.
प्रवचनसार गाथा र०० मां आवे छे के ज्ञायकभाव कायम ज्ञायक पणे ज रह्यो छे. छतां अज्ञानी बीजी रीते हुं आ राग छुं, पुण्य छुं एवो अन्यथा अध्यवसाय करे छे. भाई! सूक्ष्म वात छे. जिनेन्द्र मार्ग जुदो छे. लोको बहारमां एकला क्रियाकांड-आ करवुं अने ते करवुं-एमां खूंची गया छे. एटले कांई हाथ आवतुं नथी. भगवान अमृतचंद्राचार्य टीकाकार कहे छे के प्रभु! तुं तो जाणनार स्वरूप सदाय रह्यो छे ने? जाणनार ज जणाय छे ने? अहाहा! जाणनार ज्ञायक छे ते जणाय छे एम न मानतां बंधना वशे जे ज्ञानमां पर रागादि जणाय तेना एकपणानो निर्णय करतो मूढ जे अज्ञानी तेने ‘आ अनुभूति छे ते ज हुं छुं’ एवुं आत्मज्ञान उद्रय थतुं नथी. झीणी वात, भाई! आ टीका साधारण नथी. घणो मर्म भर्यो छे.
भगवान आत्मा ज्ञायकज्योति ध्रुव वस्तु छे ए तो जाणनस्वभावे परमपारिणामिकभावे स्वभावभावरूपे ज त्रिकाळ छे. राग साथे द्रव्य एकपणे थयुं नथी; पण जाणनार जेमां जणाय छे ते ज्ञान पर्याय लंबाईने अंदर जती नथी. जाणनार सदाय पोते जणाई रह्यो छे एवी ज्ञाननी पर्याय थई रही होवा छतां आ अंदर जाणनार ते हुं छुं अर्थात् आ ज्ञाननी पर्यायमां जणाय छे ते हुं छुं एम अंदरमां न जतां कर्मने रागने वश पडयो थको बहारमां जे राग जणाय छे ते हुं छुं एम माने छे. अहा! आचार्ये सादी भाषामां मूळ वात मूकी दीधी छे. त्रिलोकीनाथ तीर्थंकर अने गणधरोनी वाणीनी गंभीरतानी शी वात! पंचमआराना संते आटलामां तो सम्यक्दर्शन पामवानी कळा अने मिथ्यादर्शन केम प्रगट थाय छे तेनी वात करी छे.