गाथा १७-१८] [ ३३
टीकाना पहेला बे पेरेग्राफ थई गया. हवे अनुपपत्तिनो त्रीजो छेल्लो पेरेग्राफ रह्यो. तेमां हवे कहे छेः-
“ज्यारे आवो अनुभूतिस्वरूप भगवान आत्मा आबाळ-गोपाळ सौने सदाकाळ पोते ज अनुभवमां आवतो होवा छतां” जुओ, शुं कहे छे? आबाळ-गोपाळ सौने एटले नानाथी मोटा दरेक जीवोने जाणवामां तो सदाकाळ (निरंतर) अनुभूतिस्वरूप- ज्ञायक-स्वरूप निज आत्मा ज आवे छे. (अनुभूतिस्वरूप भगवान आत्मा त्रिकाळीनुं विशेषण छे, ज्ञायकभावने अहीं अनुभूतिस्वरूप भगवान आत्मा कह्यो छे.) आबाल- गोपाल सौने जाणनक्रियाद्वारा अनुभूतिस्वरूप भगवान आत्मा ज जणाई रह्यो छे. जाणनक्रिया द्वारा सौने जाणनार ज जणाय छे. (अज्ञानीने पण समये समये ज्ञाननी पर्यायमां पोतानो ज्ञानमय आत्मा ज उर्द्धपणे जणाई रह्यो छे. जाणपणुं निज आत्मानुं छे छतां ए छे ते हुं छुं एम अज्ञानीने थतुं नथी. अज्ञानी परनी रुचिनी आडे ज्ञानमां पोतानो ज्ञायकभाव जणातो होवा छतां एनो तिरोभाव करे छे अने ज्ञानमां खरेखर जे जणाता नथी एवा राग आदि परज्ञेयोनो आविर्भाव करे छे.)
अहाहा! आम सदाकाळ सौने पोते ज एटले के आत्मा ज जाणवामां आवे छे. (अज्ञानीओ कहे छे के आत्मा कयां जणाय छे? अने अहीं ज्ञानीओ एम कहे छे के दरेक आत्माओने पोतानो आत्मा ज जणाय छे पण अज्ञानी एनो स्वीकार करतो नथी.) पुण्य पाप आदि जे विकल्प छे ते अचेतन अने पर छे तेथी उर्द्धपणे ज्ञाननी पर्यायमां ते जणाता नथी परंतु जाणनार ज जणाय छे.
आम सौने पोते ज अनुभवमां आवतो होवा छतां अनादि बंधना वशे-एटले अनादि बंधना कारणे एम नहीं परंतु अनादि बंधने (पोते) वश थाय छे तेथी; आ जाणनार-जाणनार-जाणनार ते हुं छुं एम न मानतां राग हुं छुं एम माने छे. अनादि बंधना वशे-एटले कर्मने लईने एम नहीं; आ एक सिद्धांत छे के कर्म छे माटे विकार थाय छे एम नथी. आत्मा अनादि बंध छे एने वश थाय छे माटे विकार थाय छे. एटले के सौने जाणन-जाणन-जाणन भाव ज जाणवामां आवे छे. शरीरने, रागने जाणतां पण जाणनार ज जणाय छे. पण अनुभूतिस्वरूप आत्मा हुं छुं, आ जाणनार ते हुं छुं, एम अज्ञानीने न थतां बंधने वश पडयो छे. आत्माने वश थवुं जोईए एने बदले कर्मने वश थयो छे. पूजामां आवे छे ने केः-