Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३२ ] [ गाथा १७-१८

आत्माने अनुभवना वेदनमां आवता रागादि जे अनेक पर्यायरूप भेदभावो तेमनी साथे मिश्रितपणुं एटले ज्ञान अने राग बन्ने एकमेकपणे लागवापणुं हतुं. ते ज्यारे सर्वप्रकारे भेदज्ञाननुं प्रवीणपणुं थवाथी अर्थात् रागथी खसीने स्वभाव तरफनो झूकाव थवाथी ‘आ अनुभूति छे ते ज हुं छुं’ -ज्ञानमां जे अनुभूतिस्वरूप त्रिकाळी जणायो ते ज हुं छुं एवुं आत्मज्ञान प्राप्त थाय छे. रागथी भिन्न पडीने आ अनुभवस्वरूप भगवान आत्मा ते हुं छुं एवा आत्मज्ञानथी प्राप्त थतुं, आ आत्मा शुद्ध अखंड अभेद एक चैतन्यरूप जेवो ज्ञानमां जणायो तेवो ज छे एवी प्रतीति जेनुं लक्षण छे एवुं, श्रद्धान उद्रय थाय छे. भेदज्ञाननी प्रवीणताथी अर्थात् रागथी भिन्न पडी भगवान ज्ञानस्वरूप आत्माना अनुभवथी आत्मा अखंड एक ज्ञायकरूप जेवो जाण्यो तेवी ज तेनी प्रतीति करी. जाण्या विना ए छे ए मान्युं कोणे? सम्यग्दर्शननुं लक्षण प्रतीति छे. पंचाध्यायीमां चार बोल लीधा छे. श्रद्धा, प्रतीति, रुचि, ज्ञाननी पर्याय. त्यां एने ज्ञाननी पर्याय गणी ए तो व्यवहारथी कथन छे. अहीं तो आ निश्चयनी वात छे के जे आत्मा ज्ञानमां जणायो एनी जे श्रद्धा थई ते प्रतीति. माटे सम्यग्दर्शननुं लक्षण प्रतीति छे.

आत्मा आखी चीज छे. तेनुं ज्ञान ए आत्मज्ञान कह्युं छे. आत्मामां गुणनुं के पर्यायनुं ज्ञान ते आत्मज्ञान एम नथी. आखो आत्मा एटले जे त्रिकाळी ध्रुव अखंड एक प्रतिभासमय पूर्णस्वरूप ते पर्यायमां जणायो, एनुं जे ज्ञान थयुं ते पर्याय आत्मज्ञान छे. सादी भाषा छे, पण लोको एकान्त एकान्त करे छे. व्यवहारथी थाय एम व्यवहारने साधन कहेता नथी एम कहे छे, पण भाई! आ सम्यक् एकान्त छे, ‘ज’ बधे पडयो छे ने? श्रीमदे पण कह्युं छे के “अनेकान्तनुं ज्ञान पण एकान्त एवा निजपदनी प्राप्ति सिवाय अन्य कोई हेतुए हितकारी नथी.” सम्यक् एकान्त एवा आत्माना हित सिवाय बीजुं कोई अनेकान्त होई शके नहि.

अहाहा! आवुं आत्मज्ञान थतां श्रद्धान उद्रय थाय छे त्यारे समस्त अन्यभावोनो भेद थवाथी एटले दया, दान, भक्ति आदिना शुभभावो जे अन्यभावो छे तेनी जुदाई थवाथी निःशंक ठरवाने समर्थ थवाने लीधे आत्मानुं आचरण उद्रय थतुं आत्माने साधे छे. रागना विकल्पथी जुदो छुं एवुं भेदज्ञान थवाथी स्वरूपमां निःशंक ठरवाने लीधे आत्मानुं चारित्र-आत्मानुं अनुष्ठान-आत्मामां रमणता प्रगट थाय छे अने ते आत्माने साधे छे. व्यवहारना विकल्पथी भिन्न पडीने स्वरूपमां निःशंक ठरतां ए आचरण आत्मानी सिद्धिने साधे छे. आम साध्य आत्मानी सिद्धिनी ए रीते उपपत्ति छे. साध्य जे मोक्षदशा तेनी सिद्धि-प्राप्ति ए रीते थाय छे, बीजी रीते नहि. अज्ञानी मिथ्याद्रष्टिने स्वनुं आचरण होतुं नथी. (तेथी साध्यनी सिद्धि तेने थती नथी.)