Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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प्रवचन रत्नाकर भाग-२ ] [ ३१ केटलाक कहे छे के पंचमहाव्रत पाळवां, त्याग करवो, परिषह सहन करवा इत्यादि कष्ट सहन करीए तो धर्म थाय अने केवळज्ञाननी प्राप्ति थाय. अहीं तो कहे छे के कष्ट ए धर्म नथी पण भगवान आत्मामां एकाग्र थतां एमां आनंद आवे ए धर्म छे. आनंदनी लहेरोनो अनुभव करतां करतां केवळज्ञानने पामे, पण कष्ट सहन करे तो पामे एम नथी. भाई! वस्तु तो सहजानंदस्वरूप छे. स्वाभाविक आनंदने आधीन थतां, अतीन्द्रिय आनंदने वेदतां वेदतां केवळज्ञान थई जाय छे. आ वस्तुनुं स्वरूप ज आवुं छे, अर्थात् साध्यनी सिद्धि ए रीते थाय छे, बीजी रीते थती नथी.

केटलाक एम कहे छे के निश्चयथी थाय अने व्यवहारथी पण थाय, निश्चय पण मोक्षमार्ग अने व्यवहार पण मोक्षमार्ग, जेम निश्चय आदरणीय तेम व्यवहार पण आदरणीय; पण एम नथी. अहाहा....! एकलो भगवान आत्मा जाणवो, श्रद्धवो अने एमां ठरवुं ए एक ज मोक्षमार्ग छे. तो कहे छे-व्यवहार कह्यो छे ने? भाई, ए तो उपचारथी कथन कर्युं छे, पण मोक्षमार्ग बे नथी. मार्ग एटले कारण. मोक्षमार्ग एटले मोक्षनुं कारण. ए मोक्षनुं कारण एक ज छे, बे कारण नथी. मोक्षमार्ग एक ज छे एटले शुं? के कार्य जे सिद्धदशा एनुं कारण एक निश्चय कारण ज छे. बीजुं हो भले, पण ते जाणवा माटे; बाकी कारण नथी. आवी स्थिति सीधी छे पण पक्षना व्यामोह आडे सूझ पडे नहीं अने (साचा रस्ते) फरवुं गोठे नहीं. आटलां वर्ष शुं कर्युं? ते धूळ कर्युं. (बधुं व्यर्थ) सांभळने! त्रणलोकना नाथने जगाडयो नहीं, एनी श्रद्धा करी नहीं अने एमां ठर्यो नहीं तो शुं कर्युं? (कांई कर्युं नहीं.)

हवे ए वात विशेष समजावे छेः-

ज्यारे आ आत्माने अनुभवमां आवता जे अनेक पर्यायरूप भेदभावो तेमनी साथे मिश्रितपणुं होवा छतां-एटले भगवान आत्माना ज्ञानमां पुण्य-पाप दया, दान, व्रत, आदि अनेक पर्यायरूप भेदभावो तेनी साथे मिश्रित होवा छतां सर्व प्रकारे भेदज्ञानमां प्रवीणपणाथी ‘आ अनुभूति छे ते ज हुं छुं’ अर्थात् जाणवानी दशा जे अनुभवमां आवे छे ते ज हुं छुं अने ज्ञानमां जणाय छे ते दया, दान, रागादि व्यवहार ते हुं नथी एम आत्मज्ञान प्राप्त थाय छे. अहीं कह्युं ने के ज्ञानमां जणाय के आ रागादि छे, पण ए मोक्षमार्ग नथी. १२ मी गाथामां पण कह्युं के-“व्यवहारनय ते काळे जाणेलो प्रयोजनवान छे.” ते काळे एटले ते ते समये जेटला प्रमाणमां रागनी अशुद्धताना अने वीतरागता-शुद्धताना अंशो छे तेने जाणवा ए भेदरूप व्यवहारज्ञान छे. ए जाणेलो प्रयोजनवान छे, आदरेलो प्रयोजनवान नथी. आवी चोकखी स्पष्ट वात होवा छतां घणा वर्षोथी (अनंतकाळथी) मान्युं-मनाव्युं होय एटले फरवुं कठण पडे. पण जीवन जाय छे जीवन. (खोटी मान्यतामां आयुष्य पूरुं थई जशे). मार्ग तो आ छे, भाई!