Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३० ] [ गाथा १७-१८ ते हराम (कुचारित्र). आत्माना आनंदमां रमवुं, निजानंदमां रमवुं ए चारित्र छे. हवे लोको कांई ने कांई क्रिया अने बहारनां पंचमहाव्रतादिने मोक्षनो मार्ग-साधन माने छे, पण भाई! ए कांई साधन नथी. परंतु निमित्तथी कथन करीने कह्युं छे. त्रण लोकनो नाथ जे सिद्धस्वरूपी परमात्मा एनुं ज्ञान, श्रद्धान थाय त्यारे एमां ठरे. ए ज्ञायकस्वरूप आनंदघन भगवान आत्मामां चरवुं, रमवुं, लीन थवुं, स्थिरता करवी ए अनुभव छे, ए चारित्र छे. अहाहा! कह्युं छे ने केः-

“अनुभव चिंतामनि रतन अनुभव है रसकूप,
अनुभव मारग मोखकौ, अनुभव मोख सरूप.”

केटलाक कहे छे के कानजीस्वामीनुं आ बधुं एकान्त छे. पण एम नथी. कारण के अहीं तो सम्यक् एकान्त सिद्ध करे छे, के एमां (आत्मामां) ज आचरण करवुं. रागनुं आचरण करवुं एम नहीं. पहेलां एनी श्रद्धामां तो नक्की करे के भगवान आनंदनो नाथ प्रभु जे अंदरमां जणायो अने श्रद्धामां आव्यो एमां ठरवुं ए चारित्र छे. व्रत, तप, उपवास आदि कांई चारित्र नथी. उपवास एटले उप नाम समीपमां-भगवान आनंदना नाथनी समीपमां वास एटले वसवुं-अनुभव वडे वसवुं. आत्मामां अनुभव वडे लीन थवुं ए चारित्र छे. अतीन्द्रिय आनंदनो नाथ भगवान आत्मा ज्ञानमां जणायो एवो श्रद्धयो के आ अंदर स्वरूपथी देखायो ते आत्मा अने एमां ठरवुं एनो अनुभव करवो ते चारित्र. आवा अनुभवनी महोर-छाप विशे पांचमी गाथामां आवे छे के आत्मानो निजविभव केवो छे? “निरंतर झरतो आस्वादमां आवतो सुंदर जे आनंद तेनी छापवाळुं जे प्रचूर संवेदनस्वरूप स्वसंवेदन तेनाथी जेनो जन्म छे.” आवो आनंदनो अनुभव ते आत्मानो साक्षात्कार छे. अनुभव, अनुभव एम तो बीजा बधा अन्यमतीओमां पण कहे छे पण ए अनुभव नथी.

आ प्रमाणे मोक्षार्थी पुरुषे प्रथम आत्माने जाणवो, पछी तेनुं ज श्रद्धान करवुं के ‘आ ज आत्मा छे’ अने तेनुं आचरण करवाथी अवश्य कर्मोथी छूटी शकाशे, अने त्यारपछी तेनुं ज अनुचरण करवुं-अनुभव वडे तेमां लीन थवुं; कारण के साध्य जे निष्कर्म अवस्थारूप अभेद शुद्धस्वरूप तेनी सिद्धिनी ए रीते उपपत्ति छे, अन्यथा अनुपपत्ति छे. जे मोक्षार्थी थयो तेने मोक्ष अवस्था साध्य छे. ए राग विनानी, कर्म विनानी निर्मळ अवस्था छे. ए निर्मळ अवस्थारूप अभेद शुद्धस्वरूपनी ए रीते उपपत्ति छे अन्यथा अनुपपत्ति छे. एटले एनी प्राप्तिनो आ उपाय छे, बीजो कोई उपाय नथी. आ अनेकान्त छे. आनाथी प्राप्ति थाय अने व्यवहारथी पण प्राप्ति थाय एम अनेकान्त नथी. आनाथी ज थाय अने बीजी रीते न थाय ए अनेकान्त छे.

छहढाळामां आवे छे के “आतम हित हेतु विराग ज्ञान, ते लखै आपकुं कष्टदान.”