Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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प्रवचन रत्नाकर भाग-२ ] [ २९

आ पूर्णानंद अतीन्द्रिय आनंदकंद सच्चिदानंद परमस्वभावरूप आत्मा छे ते ज हुं छुं एम श्रद्धा करवी. एनी श्रद्धामां एम आव्युं के आ अंदर जे प्रत्यक्ष जणायो ए ज आत्मा छे अने तेनुं आचरण करवाथी एटले के तेमां एकाग्र थवाथी अवश्य कर्मोथी छूटी शकाशे. शुं कह्युं? जुओ, तेनुं आचरण करवाथी एटले जे ज्ञायकभाव-स्वभाव-भाव ज्ञाननी पर्यायमां प्रत्यक्ष जणायो अने जेनी श्रद्धा थई के आ ज आत्मा छे एमां आचरण करीश तो कर्मोथी छूटाशे. बीजी कोई क्रिया तो छे नहीं. बहारनां क्रियाकांड-व्रत अने तप करीश तो कर्मोथी छूटाशे एम एनी श्रद्धामां नथी आवतुं. घणुं गंभीर भर्युं छे, भाई! एक तो ए के आत्माने सीधो जाणवो. एटले के व्यवहार आवो होय तो जणाय ए वात काढी नाखी. बीजुं ए के आ आत्मा छे एम जाण्युं तेथी एनी श्रद्धामां एम आव्युं के आत्मामां ठरीश त्यारे कर्म छूटशे, पण आटला उपवास करवाथी कर्म छूटशे एम नहि. त्यां प्रश्न थाय के शास्त्रमां (तत्त्वार्थसूत्रमां) आवे छे के-तपवा निर्जरा उत्तर एम छे के ए तो निमित्तनां कथन छे. मार्ग तो आवो छे, भाई!

अरेरे! चोरासीना अवतारमां ए दुःखी छे. एने एना दुःखनी खबर नथी. पण ए आकुळताना वेदनमां छे, भाई! जैनना वेदनमां, स्वना वेदनमां नथी. छहढाळामां चोथी ढाळमां आवे छे के ए आकुळताना वेदनमां साधु थई नवमी ग्रैवेयके गयो. एणे पंच महाव्रत अने र८ मूलगुणनुं पालन कर्युं पण ए आकुळतानुं वेदन हतुं.

“मुनिव्रत धार अनंतबार ग्रैवक ऊपजायो,
पै निज आतमज्ञान विना सुख लेश न पायो.”

प्रश्नः–मंद आकुळता हती ने?

उत्तरः–मंद पण आकुळता हती ने? तेथी तो कह्युं के सुख लेश न पायो. बापु! आ तो वीतरागस्वरूप आत्मानो मार्ग छे. आ आत्मा छे तेनुं आचरण करवाथी जरूर कर्मोथी छूटाशे एवी श्रद्धामां एम आव्युं के निज ज्ञायकभावमां जेटली रमणता करशे तेटलुं चारित्र थशे अने तेटलुं कर्मोथी छूटाशे. पहेलां श्रद्धामां ज आम जणायुं. लोकोने आकरुं लागे, पण शुं थाय?

अहीं कहे छे के आत्मा एकलो ज्ञेय थईने अंदर ज्ञानमां जणायो त्यारे तेने आ आत्मा छे एम श्रद्धा थई. त्यारे ए श्रद्धामां एम आव्युं के आ ज्ञायकभाव जे भगवान आत्मा तेनुं अनुचरण करवाथी, एमां ठरवाथी कर्म जरूर छूटशे, पण पंचमहाव्रतना विकल्प ए आत्मानुं अनुचरण नहि होवाथी तेनाथी कर्म छूटशे नहि. अंदर एक ज्ञायकभावमां एकाकार थवुं, एमां रमवुं, चरवुं, जामी जवुं, आनंदनुं वेदन करवुं-एनाथी कर्म छूटशे, मलिन परिणाम छूटशे. आवी वात छे, भाई! दुनिया साथे मेळ खाय एम नथी. पण शुं थाय? आत्मामां रमे ते राम कहीए. अन्यत्र रमे