गाथा १७-१८] [ ४७ आप सर्वज्ञ छो एम अमे निर्णय कर्यो छे; केम के आपनी सर्वज्ञनी पर्यायमां भूत- वर्तमान-भावि पर्यायो सहित तथा एक समयनो काळ अने जगतना अनंता द्रव्योने एक समयमां उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य सहित आपे जाण्या, एक समयमां त्रणनो निर्णय कर्यो. काळ त्रण, अनंता द्रव्यो त्रण (उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य) सहित अने समय एकमां (एक समयमां) आपे जाण्यां. आम एक समयमां त्रण, सर्वज्ञ सिवाय कोई कही शके नहि तेथी आप सर्वज्ञ छो एम अमे निश्चय कर्यो छे. आ रीते केवळज्ञाननो स्वीकार कर्यो कहेवाय.
हवे फरीथी शिष्य पूछे छे के ज्ञाननी उत्पत्ति स्वयंबुद्धत्वथी एटले पोते पोताथी आत्मामां ज्ञान अने आनंदनी जागृति करे अथवा बोधितबुद्धत्वथी एटले बीजो कोई समजाववावाळो मळे त्यारे समजे-‘जो आम छे तो जाणवाना कारण पहेलां शुं आत्मा अज्ञानी ज छे केम के तेने सदाय अप्रतिबुद्धपणुं छे?’ शिष्यनो प्रश्न एम छे के भगवान आत्मा ज्ञाता-द्रष्टा छे एवुं भान हजु थयुं नथी तो पहेलांथी ए अज्ञानी छे, अप्रतिबुद्ध छे? आत्मा तो ज्ञानस्वरूपी छे, जाणवाना स्वभाववाळो ज्ञानवाळो तो छे, तो पछी एने अज्ञानी केम कहेवाय?
उत्तरः–ए वात एम ज छे, ते अज्ञानी ज छे. केम के एणे आत्मा ज्ञाता-द्रष्टा छे एवो अनुभव कदी कर्यो नथी. अहाहा! वस्तु त्रिकाळी ज्ञानस्वभावी होवा छतां ‘ज्ञान ते आत्मा’ एवो अनुभव कर्यो नथी त्यांसुधी ते अज्ञानी अने मूढ छे. चाहे ते दया, दान, व्रत, तप, भक्ति इत्यादि लाख-करोड-अनंतवार करे तोपण अज्ञानी ज छे, केम के ए तो शुभराग छे, धर्म नथी.
धर्म तो वस्तुना स्वभावने कहे छे. कह्युं छे ने के-‘वत्थु सहावो धम्मो’ वस्तुनो स्वभाव ते धर्म. वस्तु जे आत्मा छे तेमां अनंतगुणो (धर्मो) रहेला छे, वसेला छे. तेथी तेने वस्तु कहे छे. गोम्मटसारमां आवे छे के जेमां अनंत गुण वस्या-रहेला छे तेने वस्तु कहे छे. अहाहा! ज्ञान, आनंद, शांति, वीतरागता, स्वच्छता, इश्वरता इत्यादि अनंतगुण वस्तुमां वसेला छे एवी अंतरद्रष्टिपूर्वक स्वीकार, श्रद्धा-प्रतीति करीने, अनंत-गुणसंपन्न भगवान आत्मा छे तेनी तरफना झूकावथी-स्वभावसन्मुखताथी एकता थवी तेनुं नाम धर्म छे. बाकी बधी वातो छे, भाई!
ज्यारे ए ज्ञानस्वरूप भगवान आत्मा पोते पोताथी अंदरमां एकाग्र थाय अथवा कोई समजाववावाळो मळे तेनाथी अंदर एकाग्र थाय त्यारे ए ज्ञानी थाय छे. शिष्य