४८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ पूछे छे के ए ज्ञानी थया पहेलां अज्ञानी हतो? तो कहे छे हा, ए अज्ञानी ज हतो. भले पछी ए दिगंबर साधु होय, हजारो राणीओनो त्यागी होय के बाळब्रह्मचारी होय; ज्यांसुधी आत्माना ज्ञाननी एक्तारूप धर्म न कर्यो त्यांसुधी अज्ञानी ज छे.
वळी फरी पूछे छे के आ आत्मा केटला वखत सुधी (कयां सुधी) अप्रतिबुद्ध छे ते कहो, तेना उत्तररूप गाथासूत्र कहे छेः-
[प्रवचन नंबर प८ थी ६१ * तारीख र७-१-७६ थी ३०-१-७६]