Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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प० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२

(मालिनी)
कथमपि हि लभन्ते भेदविज्ञानमूला–
मचलितमनुभूतिं ये स्वतो वान्यतो वा।
प्रतिफलननिमग्नानन्तभावस्वभावै–
र्मुकुरवदविकाराः सन्ततं स्युस्त एव।। २१ ।।

__________________________________________________ प्रतिभास करनारी स्वच्छता ज छे अने उष्णता तथा ज्वाळा अग्निनी छे तेवी रीते अरूपी आत्मानी तो पोताने ने परने जाणनारी ज्ञातृता (ज्ञातापणुं) ज छे अने कर्म तथा नोकर्म पुद्गलनां छे एम पोताथी ज अथवा परना उपदेशथी जेनुं मूळ भेदविज्ञान छे एवी अनुभूति उत्पन्न थशे त्यारे ज (आत्मा) प्रतिबुद्ध थशे.

भावार्थः– जेम स्पर्शादिमां पुद्गलनो अने पुद्गलमां स्पर्शादिनो अनुभव थाय

छे अर्थात् बन्ने एकरूप अनुभवाय छे, तेम ज्यां सुधी आत्माने, कर्म-नोकर्ममां आत्मानी अने आत्मामां कर्म-नोकर्मनी भ्रांति थाय छे अर्थात् बन्ने एकरूप भासे छे, त्यां सुधी तो ते अप्रतिबुद्ध छे; अने ज्यारे ते एम जाणे के आत्मा तो ज्ञाता ज छे अने कर्म-नोकर्म पुद्गलनां ज छे त्यारे ज ते प्रतिबुद्ध थाय छे. जेम अरीसामां अग्निनी ज्वाळा देखाय त्यां एम जणाय छे के “ज्वाळा तो अग्निमां ज छे, अरीसामां नथी पेठी, अरीसामां देखाई रही छे ते अरीसानी स्वच्छता ज छे”; ते प्रमाणे “कर्म-नोकर्म पोताना आत्मामां नथी पेठां; आत्मानी ज्ञान-स्वच्छता एवी ज छे के जेमां ज्ञेयनुं प्रतिबिंब देखाय; ए रीते कर्म-नोकर्म ज्ञेय छे ते प्रतिभासे छे”-एवो भेदज्ञानरूप अनुभव आत्माने कां तो स्वयमेव थाय अथवा उपदेशथी थाय त्यारे ज ते प्रतिबुद्ध थाय छे.

हवे, आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-

श्लोकार्थः– [ये] जे पुरुषो [स्वतः वा अन्यतः वा] पोताथी ज अथवा परना उपदेशथी [कथम् अपि हि] कोई पण प्रकारे [भेदविज्ञानमूलाम्] भेदविज्ञान जेनुं मूळ उत्पत्तिकारण छे एवी [अचलितम्] अविचळ (निश्चळ) [अनुभूतिम्] पोताना आत्मानी अनुभूतिने [लभन्ते] पामे छे, [ते एव] ते ज पुरुषो [मुकुरवत्] दर्पणनी जेम [प्रतिफलन–निमग्न–अनन्त–भाव–स्वभावैः] पोतामां प्रतिबिंबित थयेला अनंत भावोना स्वभावोथी [सन्ततं] निरंतर [अविकाराः] विकाररहित [स्युः] होय छे, - ज्ञानमां जे ज्ञेयोना आकार प्रतिभासे छे तेमनाथी रागादि विकारने प्राप्त थता नथी. र१.