Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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गाथा-१९] [ प१ उपोद्घातः–

हवे शिष्यनो प्रश्न छे के-आत्मा केटला वखत सुधी अप्रतिबुद्ध रहे छे?

महाराज! आप आ आत्माने अनादिथी अप्रतिबुद्ध कहो छो. तेणे अनंतवार दया, व्रत, तप, ब्रह्मचर्य, आदि पाळ्‌यां तोपण आत्मानुं सेवन कर्युं नथी एम कहो छो तो हवे ते कयां सुधी अप्रतिबुद्ध रहेशे ते कहो. तेना उत्तररूपे गाथासूत्र कहे छेः-

* गाथा १९ः टीका उपरनुं प्रवचन *

अमृतचंद्राचार्य द्रष्टांत आपे छेः-जेवी रीते स्पर्श, रस, गंध, वर्ण आदि भावोमां तथा पहोळुं तळियुं, पेटाळ आदिना आकारे परिणत थयेल पुद्गल स्कंधोमां, आ घडो छे’ एम, अने घडामां ‘आ स्पर्श, रस, गंध, वर्ण आदि भावो तथा पहोळुं तळीयुं, पेटाळ आदिना आकारे परिणत पुद्गल स्कंधो छे’ एम वस्तुना अभेदथी अनुभूति थाय छे; आ द्रष्टांत थयुं. तेवी रीते कर्म-मोह-शुभाशुभराग आदि अंतरंग परिणामो तथा नोकर्म-शरीरादि बाह्य वस्तुओ-ए बधां पुद्गलनां परिणाम छे. जेम स्पर्श, रस, गंध, वर्णमां घडो छे अने घडामां स्पर्श, रस, गंध, वर्ण छे एम पुण्य- पापना अंतरंग परिणाम भावकर्म अने जडकर्म तथा नोकर्म-शरीर, मन, वाणी आदि बहिरंग पुद्गल परिणामो छे. अहाहा! अंदरमां दया, दान, व्रत, भक्ति आदि जे रागभाव थाय ते बाह्य वस्तु छे, केम के जेम आत्मामां ज्ञान अने आनंद स्वभाव छे तेम पुण्य-पापना भाव तेनो स्वभाव नथी. ए आत्मा नथी.

भगवान आत्मामां अंतरंगमां जे पुण्य-पाप देखाय छे ते, जड कर्म तथा शरीरादि नोकर्म-ए त्रणेय पुद्गलपरिणामो आत्मानो तिरस्कार करनारा छे. जुओ, शुभ-अशुभभावने पुद्गलपरिणाम कह्या केमके ते आत्मानो अनादर करवावाळा छे. जेओ रागनी रुचिवाळा छे तेओ आत्मानो अनादर करे छे. रागभाव ज आत्मानो अनादर करवावाळो छे.

पुण्य-पापरूप भावकर्म, जड द्रव्यकर्म अने शरीरादि नोकर्म ए त्रणेय पुद्गलनी जात छे; भगवान आत्मा ज्ञाननी जात छे. पुण्य-पापना भावमां ज्ञानना अंशनो अभाव छे. ए त्रणेय पुद्गलपरिणामोनो चैतन्यभावमां अभाव छे. ए त्रणेय भगवान आत्माना परिणाम नथी, केमके भगवान आत्मा ज्ञानस्वभावी वस्तु होवाथी एना परिणाम ज्ञानरूप होय; ज्यारे आ त्रणेयमां चैतन्यना अंशनो अभाव छे. व्यवहाररत्नत्रय ए शुभराग छे, ए पुद्गलना परिणाम छे केमके ए (राग) चैतन्यथी खाली छे. आवी वात बहु भारे, भाई. लोकोने तो एवुं लागे के आ सोनगढवाळाओए ‘निश्चयथी धर्म’ ए नवो शोध्यो. सहेलो सट लईने बेठा छे. व्रत अने तपमां दुःख पडे, कष्ट पडे एटले सहेलो धर्म काढयो. बस आत्मा जाणो, आत्मा जाणो-ए धर्म. अरे भगवान! तुं सांभळ तो खरो. प्रभु! तुं आत्मा चैतन्यचमत्कार वस्तु छे. ए चैतन्यचमत्कारमां एकाग्र थवुं एनुं नाम धर्म