प२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ छे. ए चैतन्यचमत्कारने छोडी जे दया, दान, व्रतादि छे ते अचेतन छे. ते ज्ञानस्वरूप चैतन्यनी जात नथी. सीधी सादी भाषा छे. वस्तु आवी छे, भाई.
घडाना द्रष्टांते-ए पुण्य-पाप आदि भावकर्म, अने द्रव्यकर्म तथा शरीर, मन, वाणी आदि नोकर्म ए त्रणेमां आत्मा छे अने ए त्रणेय चीज आत्मामां छे एवी जेनी मान्यता छे ते मिथ्याद्रष्टि अज्ञानी-अप्रतिबुद्ध छे. परसत्तानुं पोतामां होवापणुं मानवुं ए मिथ्यात्वभाव छे. कोई कहे के व्यवहारथी (धर्म) थाय. पण भाई, व्यवहार ए शुभरागनी क्रिया छे अने शुभराग छे ए अचेतन छे, पुद्गलपरिणाम छे. चेतन आत्मा अचेतन पुद्गलपरिणाममां छे अने पुद्गलपरिणाम आत्मामां छे एवी मान्यता अज्ञानीनी छे. भले ने नग्न साधु केम न होय, ‘रागना परिणाममां हुं छुं अने मारामां रागना परिणाम छे’-एवी मान्यता जो तेने होय तो ते अज्ञानी छे, अप्रतिबुद्ध छे. अहाहा! कर्म-मोह आदि अंतरंग परिणाम एटले मोह-राग-द्वेषादि भावकर्म अने जड कर्म तथा नोकर्म-शरीरादि-ए बधी बाह्य वस्तुओ छे. आ बाह्य वस्तुमां हुं छुं अने बाह्य वस्तु मारामां छे एम माननार बहिरात्मा-मिथ्याद्रष्टि छे. अहो! आचार्यदेवे सत्ने समजावनारी मीठी अने मधुर टीका करी छे.
भगवान! बहिरात्मा कोने कहीए अने अंतरात्मा कोने कहीए? के जे अंदर रागनी क्रियाना पुण्य-पापरूप, दया, दान, भक्ति, व्रत आदिरूप भाव थाय छे ते पुद्गल-परिणाम छे अने बाह्य छे. तेमां हुं छुं अने तेथी मने लाभ छे एम माननार बहिरात्मा छे. बहु आकरुं पडे. पेला भक्तिवाळा एम कहे के भक्ति करो, एम करतां करतां धर्म थशे; आ दया पाळवावाळा एम कहे के परनी दया पाळो, तेथी धर्म थशे अने शरीरना बळिया होय ते एम कहे उपवासादि तप करो, एम करवाथी धर्म थशे. आ त्रणे मंदरागनी क्रिया छे. आ मंदरागनी क्रियाथी लाभ माननारा रागनी रुचिवाळा बहिरात्मा छे, अज्ञानी छे.
अहाहा! अहीं तो दांडी पीटीने कहेवाय छे के भगवान जिनेन्द्रदेवनो कहेलो धर्म ए अलौकिक चीज छे. एवी चीज बीजे कयांय नथी. पण एना घरमां (दिगंबर जैनमां) जेणे जन्म लीधो छे एने य खबर नथी. अहीं त्रण वात कहे छेः-पुण्य- पापरूपभाव ए भावकर्म, ज्ञानावरणादि जड कर्म अने शरीरादि नोकर्म ए त्रणेय पुद्गलपरिणाम छे, एक वात. ए आत्माना तिरस्कार करवावाळा छे ए बीजी वात अने आम होवा छतां तेमां हुं छुं अने ए परिणाम मारामां छे एम वस्तुना अभेदथी ज्यां सुधी अनुभूति छे त्यां सुधी आत्मा अप्रतिबुद्ध छे, मिथ्याद्रष्टि छे. शुं कहे छे? शुभराग आदि पुद्गल-परिणाम छे. ए जीवस्वभावमां तो नथी पण जीवनो तिरस्कार करवावाळा छे. तेथी पुण्यभाव आदि भावकर्म तथा शरीर, मन, वाणी, स्त्री, कुटुंब, परिवार आदि नोकर्मनो